सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं की कीमत पर NPPA की जांच की, फार्मा कंपनियों से ₹8,447 करोड़ की वसूली लंबित होने पर सवाल उठाए
किस परीक्षा के लिए कितनी ज़रूरी
- UPSC8/10
- BPSC7/10
- UPPSC7/10
- SSC7/10
1खबर एक नज़र में
सर्वोच्च न्यायालय ने दवा मूल्य नियंत्रण के प्रति सरकार के 'कैलिब्रेटेड' दृष्टिकोण पर सवाल उठाया है। न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आर्थिक नीति नागरिकों के सस्ती स्वास्थ्य सेवा के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकती। इसने आवश्यक दवाओं पर व्यापार मार्जिन तय करने में देरी के लिए राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की जांच की और फार्मा कंपनियों से अधिक शुल्क लेने के लिए लंबित पड़ी भारी वसूली का मुद्दा उठाया।
न्यायिक जांच
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र की दवा मूल्य निर्धारण नीति पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया कि आर्थिक नीति नागरिकों के जीवन पर प्राथमिकता नहीं ले सकती।
मूल्य नियंत्रण कार्रवाई
NPPA ने 137 गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन को MRP के 30% पर सीमित कर दिया, जो 9 नवंबर, 2026 से प्रभावी है।
भारी लंबित बकाया
NPPA ने फार्मा कंपनियों से अधिक शुल्क लेने के लिए मांगे गए ₹10,000 करोड़ से अधिक में से केवल लगभग 16% (₹1,582.4 करोड़) ही वसूल किए हैं।
2याद रखने वाले तथ्य
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3विस्तृत विश्लेषण
संदर्भ / पृष्ठभूमि
भारत आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO), 2013 के माध्यम से दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करता है। राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में सूचीबद्ध दवाओं के लिए अधिकतम मूल्य तय करता है। इस 'अनुसूचित' सूची से बाहर की दवाएं सीधे मूल्य-नियंत्रित नहीं होती हैं, जिससे अक्सर उच्च व्यापार मार्जिन होता है, खासकर कैंसर-रोधी दवाओं जैसी महत्वपूर्ण दवाओं के लिए, जिससे मरीजों पर बोझ पड़ता है।
मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ
सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप सार्वजनिक स्वास्थ्य और बाज़ार अर्थशास्त्र के बीच तनाव को उजागर करता है। केंद्र का 'कैलिब्रेटेड दृष्टिकोण' सामर्थ्य को फार्मास्युटिकल नवाचार और निवेश को प्रोत्साहित करने के साथ संतुलित करने का तर्क देता है। हालांकि, NPPA की निष्क्रियता और ₹8,447 करोड़ की भारी लंबित वसूली पर न्यायालय का ध्यान कमजोर प्रवर्तन की ओर इशारा करता है। 'अनुसूचित' और 'गैर-अनुसूचित' दवाओं के बीच का अंतर एक नियामक खामी पैदा करता है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला में अत्यधिक मुनाफाखोरी की अनुमति मिलती है, जिसे न्यायालय ने 'खेल' करार दिया।
भविष्य की संभावनाएं / आगे का रास्ता
न्यायालय ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है, और इसका अंतिम निर्णय DPCO के सख्त प्रवर्तन को अनिवार्य कर सकता है, संभावित रूप से अनुसूचित दवाओं की सूची का विस्तार कर सकता है या समान व्यापार मार्जिन को अनिवार्य कर सकता है। इससे मजबूत मूल्य नियंत्रण तंत्र हो सकते हैं, जो फार्मास्युटिकल कंपनियों की लाभप्रदता को प्रभावित कर सकते हैं और संभावित रूप से एक समग्र स्वास्थ्य सेवा नीति की आवश्यकता पर बहस छेड़ सकते हैं जो उद्योग के विकास को बाधित किए बिना सामर्थ्य सुनिश्चित करती है।
4पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी
- राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA)
- रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग के तहत एक स्वतंत्र नियामक, जिसकी स्थापना 1997 में हुई थी। यह नियंत्रित थोक दवाओं और फॉर्मूलेशन की कीमतें तय और संशोधित करता है तथा उनकी उपलब्धता को लागू करता है।
- औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO)
- आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत भारत सरकार द्वारा जारी एक आदेश। वर्तमान आदेश DPCO 2013 है।
- आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM)
- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा तैयार की गई एक सूची जिसमें वे दवाएं शामिल हैं जो अधिकांश आबादी की प्राथमिकता वाली स्वास्थ्य सेवा आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। इस सूची में शामिल दवाएं DPCO के तहत मूल्य नियंत्रण (अनुसूचित फॉर्मूलेशन) के अधीन हैं।
5परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- डेटा: ₹8,447.4 करोड़ (मार्च 2026 तक NPPA द्वारा लंबित वसूली) और 30% (137 कैंसर-रोधी दवाओं के लिए व्यापार मार्जिन सीमा)।
- नोडल निकाय: औषध विभाग के तहत राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA)।
- कानूनी बिंदु: आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत जारी औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013।
गलती मत करना!
'अनुसूचित' (DPCO के तहत मूल्य-नियंत्रित) को 'गैर-अनुसूचित' दवाओं के साथ भ्रमित करना, या व्यापार मार्जिन प्रतिशत को बदलना (जैसे, 16% खुदरा विक्रेता मार्जिन बनाम 30% समग्र सीमा)। वे यह भी पूछ सकते हैं कि NPPA किस मंत्रालय के अंतर्गत आता है (रसायन एवं उर्वरक, स्वास्थ्य नहीं)।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें
सार्वजनिक स्वास्थ्य में न्यायिक सक्रियता, अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य का अधिकार, नियामक अधिग्रहण बनाम सार्वजनिक कल्याण, व्यापार मार्जिन युक्तिकरण
6अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1कठिन
दवा मूल्य नियंत्रण संबंधी समाचार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.सर्वोच्च न्यायालय ने आवश्यक दवाओं पर व्यापार मार्जिन तय करने में देरी के लिए राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण पर सवाल उठाया।
- 2.औषध (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013, सभी अनुसूचित दवाओं पर 30% का एक समान खुदरा विक्रेता मार्जिन अनिवार्य करता है।
- 3.न्यायालय द्वारा उद्धृत एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, NPPA ने मार्च 2026 तक अधिक शुल्क लेने के मामलों में फार्मा कंपनियों से ₹8,400 करोड़ से अधिक वसूल किए थे।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: लेख कथन 1 का समर्थन करता है। इसमें कहा गया है कि DPCO 16% खुदरा विक्रेता मार्जिन निर्धारित करता है (कथन 2 का खंडन करता है) और केवल ₹1,582.4 करोड़ वसूल किए गए (कथन 3 का खंडन करता है), इसलिए केवल कथन 1 सही है।
- Q2मध्यम
लेख में रिपोर्ट की गई सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही के अनुसार, NPPA द्वारा 137 गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर निर्धारित व्यापार मार्जिन सीमा क्या है?
व्याख्या: लेख स्पष्ट रूप से बताता है कि NPPA ने 137 गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन को उनके अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30% पर सीमित कर दिया, जो 9 नवंबर, 2026 से प्रभावी है। 16% का आंकड़ा अनुसूचित दवाओं के लिए DPCO के तहत खुदरा विक्रेता मार्जिन है।
- Q3मध्यम
केंद्र ने अपनी दवा मूल्य निर्धारण नीति के बचाव में सर्वोच्च न्यायालय में क्या प्राथमिक तर्क प्रस्तुत किया?
व्याख्या: केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल ने उचित मूल्य पर दवाओं को सुनिश्चित करने और फार्मास्युटिकल उद्योग में नवाचार और प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने के लिए 'कैलिब्रेटेड दृष्टिकोण' का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि 'पूर्ण नियंत्रण समाधान नहीं है'।

