सरकार ने कैंसर की 137 दवाओं पर व्यापार मार्जिन सीमित किया; थायोटेपा की कीमत 91% गिरी, पेटेंट वाली दवाओं में कोई बदलाव नहीं
किस परीक्षा के लिए कितनी ज़रूरी
- UPSC7/10
1खबर एक नज़र में
राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की व्यापार मार्जिन युक्तिकरण नीति से कुछ जेनेरिक कैंसर दवाओं की कीमतों में कटौती हुई है। इसमें थायोटेपा की कीमत में सबसे ज़्यादा 91% की कमी आई है। हालांकि, पेम्ब्रोलीज़ुमैब और राइबोसाइक्लिब जैसी सभी पेटेंट वाली दवाओं की कीमतें पहले जैसी बनी हुई हैं। यह नीति अत्याधुनिक उपचारों को किफायती बनाने में सीमित असर दिखाती है।
व्यापार मार्जिन सीमा
NPPA ने कीमतों को युक्तिसंगत बनाने के लिए कैंसर की 137 दवाओं पर व्यापार मार्जिन सीमित किया, जिससे 543 फ़ॉर्मूलेशन के लिए संशोधित MRP जारी हुई।
पेटेंट वाली दवाएं अप्रभावित
पेम्ब्रोलीज़ुमैब (कीट्रूडा) और राइबोसाइक्लिब (किसकाली) जैसी पेटेंट वाली सभी दवाओं की कीमतें अपरिवर्तित रहीं, जिससे नीति में कमी उजागर हुई।
मिश्रित प्रभाव
थायोटेपा की कीमत में 91% की गिरावट आई, लेकिन 146 फ़ॉर्मूलेशन में कोई बदलाव नहीं हुआ। वहीं, 21 फ़ॉर्मूलेशन में ₹100 से भी कम की कमी देखी गई, जो नीति के सीमित समग्र प्रभाव को दर्शाता है।
2याद रखने वाले तथ्य
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3विस्तृत विश्लेषण
संदर्भ / पृष्ठभूमि
राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) के तहत दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करता है। कैंसर के उपचार को किफायती बनाने के लिए, इसने 2019 में व्यापार मार्जिन युक्तिकरण के लिए एक पायलट परियोजना शुरू की, जिसे अब कैंसर की 137 दवाओं तक बढ़ा दिया गया है। इस नीति का उद्देश्य स्टॉकिस्टों को दी जाने वाली कीमत और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच के मार्जिन को सीमित करना है।
मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ
नीति का प्रभाव बहुत असमान है। थायोटेपा जैसी जेनेरिक कीमोथेरेपी दवाओं में 91% की भारी कीमत कटौती देखी गई, लेकिन पेटेंट वाली इम्यूनोथेरेपी दवाओं (जैसे पेम्ब्रोलीज़ुमैब ₹2.16 लाख/शीशी पर) में कोई कमी नहीं आई। ऐसा इसलिए है क्योंकि मार्जिन सीमा बिक्री के पहले बिंदु पर लागू होती है, न कि विनिर्माण लागत पर। इससे कंपनियों को आधार मूल्य बढ़ाने की अनुमति मिल जाती है। यह नीति पेटेंट वाली दवाओं के एकाधिकार मूल्य निर्धारण के मूल मुद्दे को हल करने में विफल रहती है, जो भारत में कैंसर देखभाल तक पहुंच में एक बड़ी बाधा है।
भविष्य की संभावनाएं / आगे का रास्ता
के.एम. गोपाकुमार जैसे विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि पेटेंट वाली दवाओं के लिए, सरकार को मौजूदा कानूनी उपकरणों का उपयोग करना चाहिए। इनमें अनिवार्य लाइसेंसिंग (पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 92 के तहत) शामिल है, ताकि जेनेरिक उत्पादन की अनुमति मिल सके और कीमतें कम हो सकें। यह बहस बौद्धिक संपदा अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच के तनाव को उजागर करती है, जो भारत की फार्मास्युटिकल नीति में एक आवर्ती विषय है।
4पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी
- राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA)
- रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषध विभाग के तहत एक स्वतंत्र निकाय, जो औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO) के अनुसार भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार है।
- व्यापार मार्जिन
- यह वह अंतर है जिस पर निर्माता स्टॉकिस्टों/थोक विक्रेताओं को बेचते हैं और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच होता है। इस मार्जिन को सीमित करने का उद्देश्य उपभोक्ताओं के लिए अंतिम मूल्य को कम करना है।
- अनिवार्य लाइसेंसिंग (पेटेंट अधिनियम, 1970)
- यह एक प्रावधान (धारा 84 और 92 के तहत) है जो सरकार को कुछ खास परिस्थितियों में पेटेंट धारक की सहमति के बिना किसी तीसरे पक्ष को पेटेंटेड उत्पाद का उत्पादन करने की अनुमति देता है। ऐसी परिस्थितियाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करने या यदि दवा उचित और किफायती मूल्य पर उपलब्ध न हो, तब उत्पन्न होती हैं।
5परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- डेटा: 137 कैंसर दवाएं, 543 फ़ॉर्मूलेशन, थायोटेपा के लिए 91% मूल्य कटौती।
- नोडल निकाय: औषध विभाग के तहत राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA)।
- कानूनी बिंदु: पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 84/92 के तहत अनिवार्य लाइसेंसिंग।
गलती मत करना!
वे 'दवाओं की संख्या' (137) बनाम 'फ़ॉर्मूलेशन की संख्या' (543) के बारे में पूछ सकते हैं। वे पेटेंट वाली दवाओं की अपरिवर्तित कीमतों के कारण (प्रतिस्पर्धा का अभाव) को 'सरकार की इच्छाशक्ति की कमी' या 'उच्च आयात शुल्क' जैसे अन्य कारणों से भी बदल सकते हैं।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें
व्यापार मार्जिन युक्तिकरणसार्वजनिक स्वास्थ्य बनाम IPRजीवन रक्षक दवाओं की सामर्थ्यमूल्य नियंत्रण तंत्र की सीमाएं
6अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1कठिन
कैंसर दवाओं के लिए व्यापार मार्जिन पर हालिया सीमा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.मूल्य सीमा के कारण 137 चयनित दवाओं के सभी 543 फ़ॉर्मूलेशन के अधिकतम खुदरा मूल्य में कमी आई।
- 2.यह नीति पेम्ब्रोलीज़ुमैब और राइबोसाइक्लिब जैसी पेटेंट वाली कैंसर दवाओं की कीमतें कम करने में प्रभावी थी।
- 3.विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि पेटेंट अधिनियम के तहत अनिवार्य लाइसेंसिंग प्रावधान पेटेंट वाली दवाओं को किफायती बनाने के लिए एक अधिक प्रभावी उपकरण हो सकते हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि लेख में कहा गया है कि 146 फ़ॉर्मूलेशन की कीमतें अपरिवर्तित रहीं और 21 अन्य में न्यूनतम कमी देखी गई। कथन 2 गलत है क्योंकि लेख स्पष्ट रूप से कहता है कि सभी पेटेंट वाली दवाओं की कीमतें अपरिवर्तित रहीं। कथन 3 लेख में उद्धृत विशेषज्ञ के अनुसार सही है।
- Q2मध्यम
खबर के अनुसार, व्यापार मार्जिन सीमा के बाद कैंसर दवाओं के सभी 543 फ़ॉर्मूलेशन में कीमत में अनुमानित औसत बदलाव क्या था?
व्याख्या: लेख में कहा गया है: "सभी फ़ॉर्मूलेशन की कीमतों में औसत बदलाव ₹5,000 से थोड़ा अधिक था।" लेख में 'R' भारतीय रुपये के प्रतीक (₹) को दर्शाता है।
- Q3मध्यम
लेख में चर्चा के अनुसार, कैंसर दवाओं के लिए व्यापार मार्जिन युक्तिकरण नीति की एक प्रमुख सीमा के रूप में क्या पहचाना गया है?
व्याख्या: लेख में एक विशेषज्ञ का हवाला दिया गया है कि व्यापार मार्जिन युक्तिकरण से "प्रतिस्पर्धा के अभाव में" पेटेंट वाली दवाओं की कीमतों पर असर पड़ने की संभावना नहीं है। यह केंद्रीय आलोचना है, क्योंकि कंपनियां बिक्री के पहले बिंदु की कीमत में हेरफेर कर सकती हैं, जिससे मार्जिन सीमा के बावजूद अंतिम MRP उच्च बनी रहती है।
7सभी स्रोत
मूल खबर28 अक्टूबर 2026 · खबर पढ़ें
