सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूची पुनरीक्षण पर निर्वाचन आयोग से सवाल किए: 43 लाख मतदाता 'स्थानांतरित या अनुपस्थित', पूछा- दोबारा पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 क्यों भरें?
किस परीक्षा के लिए कितनी ज़रूरी
- UPSC7/10
1खबर एक नज़र में
सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के लिए निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया की जांच की। न्यायालय ने सवाल किया कि लगभग 43 लाख पहले से पंजीकृत मतदाताओं को, जिन्हें अब 'स्थानांतरित या अनुपस्थित' श्रेणी में रखा गया है, दोबारा पंजीकरण के लिए नया फॉर्म-6 क्यों भरना होगा।
न्यायिक जांच
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग के उस तर्क पर सवाल उठाया जिसमें 43 लाख मौजूदा मतदाताओं को दोबारा पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 भरने को मजबूर किया जा रहा था।
तय प्रारूप
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि फॉर्म 6, 7 और 8 चुनावी कानून के तहत निर्धारित प्रारूप हैं और निर्वाचन आयोग द्वारा इन्हें बदला नहीं जा सकता।
प्रक्रियात्मक निष्पक्षता
सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा कि जब दिल्ली में तत्काल कोई चुनाव निर्धारित नहीं है, तो दोबारा पंजीकरण के लिए 30 अक्टूबर की सख्त समय-सीमा क्यों तय की गई।
2याद रखने वाले तथ्य
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3विस्तृत विश्लेषण
संदर्भ / पृष्ठभूमि
यह विवाद निर्वाचन आयोग द्वारा दिल्ली की मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से उपजा है। 31 अगस्त, 2026 को प्रकाशित मसौदा सूची में मतदाताओं की संख्या लगभग 1.45 करोड़ से घटकर लगभग 97.53 लाख हो गई, जिससे लगभग 47.57 लाख नाम बाहर हो गए। एक बड़ा हिस्सा (लगभग 43 लाख) 'स्थानांतरित या अनुपस्थित' के रूप में वर्गीकृत किया गया था। निर्वाचन आयोग के निर्देश में इन व्यक्तियों को अपने मतदान अधिकारों को पुनः प्राप्त करने के लिए फॉर्म-6 दाखिल करने की आवश्यकता थी, जिससे एक कानूनी चुनौती उत्पन्न हुई।
मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ
सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप चुनाव प्रशासन में एक महत्वपूर्ण तनाव को रेखांकित करता है: सटीक, अद्यतन मतदाता सूचियों की आवश्यकता बनाम यह सुनिश्चित करना कि कोई भी वास्तविक मतदाता मताधिकार से वंचित न हो। मौजूदा मतदाताओं के दोबारा पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 (नए मतदाताओं के लिए) के उपयोग पर सवाल उठाकर, न्यायालय ने संभावित प्रक्रियात्मक अतिरेक पर ध्यान दिलाया। निर्वाचन आयोग द्वारा फॉर्म-6 में SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ने को एक अनावश्यक बाधा के रूप में देखा गया। यह मामला निर्धारित फॉर्मों को संशोधित करने की निर्वाचन आयोग की शक्ति की सीमाओं और मतदाताओं तक पहुंचने में उसकी सक्रिय भूमिका के कर्तव्य का परीक्षण करता है।
भविष्य की संभावनाएं / आगे का रास्ता
न्यायालय की टिप्पणियों के बाद, निर्वाचन आयोग ने आवेदन की समय-सीमा बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की। सर्वोच्च न्यायालय का रुख बताता है कि वह निर्वाचन आयोग को अधिक मतदाता-अनुकूल दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश दे सकता है, जैसे मनमानी कट-ऑफ तारीखों को हटाना और 'स्थानांतरित/अनुपस्थित' मतदाताओं की स्थिति को सत्यापित करने के लिए सक्रिय रूप से काम करना, बजाय इसके कि दोबारा पंजीकरण का पूरा बोझ उन पर डाला जाए। यह पूरे भारत में भविष्य के मतदाता सूची पुनरीक्षण के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है, जिसमें 'मतदान में आसानी' के सिद्धांत पर जोर दिया जाएगा।
4पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी
- भारत निर्वाचन आयोग
- एक स्थायी संवैधानिक निकाय (अनुच्छेद 324) जो भारत में राष्ट्रीय और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव प्रक्रियाओं के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। यह एक स्वतंत्र प्राधिकरण है।
- मतदाता सूची
- एक निर्वाचन क्षेत्र में पात्र मतदाताओं की आधिकारिक सूची। मतदाता सूचियों की तैयारी और पुनरीक्षण लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत एक मौलिक गतिविधि है।
- फॉर्म 6, 7 और 8
- मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित आवेदन पत्र। फॉर्म-6 नए नाम शामिल करने के लिए है, फॉर्म-7 नामों को शामिल करने पर आपत्ति या हटाने के लिए है, और फॉर्म-8 विवरणों में सुधार के लिए है।
5परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- डेटा: दिल्ली में लगभग 43 लाख मतदाताओं को 'शिफ्टेड या अनुपस्थित' के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
- नोडल निकाय: भारत निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक निकाय)।
- कानूनी बिंदु: फॉर्म 6, 7 और 8 मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित हैं।
गलती मत करना!
वे 'स्थानांतरित/अनुपस्थित' श्रेणी (43 लाख) के बजाय कुल बाहर किए गए मतदाताओं (47.57 लाख) की संख्या के बारे में पूछ सकते हैं, या फॉर्म-6 (नए मतदाताओं के लिए) को फॉर्म-8 (सुधार के लिए) के साथ भ्रमित कर सकते हैं।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें
न्यायिक निरीक्षण, चुनावी अखंडता बनाम मतदाता मताधिकार, प्रक्रियात्मक निष्पक्षता, संवैधानिक नैतिकता
6अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1कठिन
खबर के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग द्वारा 'स्थानांतरित या अनुपस्थित' के रूप में पहले सूचीबद्ध मतदाताओं के दोबारा पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 के उपयोग पर सवाल उठाया।
- 2.फॉर्म-6 का उद्देश्य मतदाता सूची से नाम हटाना है।
- 3.दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने मसौदा सूची में मतदाताओं की संख्या को लगभग 1.45 करोड़ से घटाकर लगभग 97.53 लाख कर दिया।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 लेख के अनुसार सही है। कथन 2 गलत है क्योंकि फॉर्म-6 नए नाम शामिल करने के लिए है; नाम हटाना फॉर्म-7 के माध्यम से किया जाता है। कथन 3 सही है क्योंकि लेख में कहा गया है कि SIR के बाद मतदाताओं की संख्या लगभग 1.45 करोड़ से घटकर लगभग 97.53 लाख हो गई।
- Q2मध्यम
खबर के अनुसार, दिल्ली में लगभग कितने मतदाताओं को 'स्थानांतरित या अनुपस्थित' के रूप में वर्गीकृत किया गया था और उन्हें फॉर्म-6 का उपयोग करके दोबारा पंजीकरण करने के लिए कहा गया था?
व्याख्या: लेख में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि लगभग 43 लाख मतदाताओं को, जिनके नाम 'स्थानांतरित या अनुपस्थित' श्रेणी में थे, फॉर्म-6 दाखिल करने के लिए कहा जा रहा था। कुल बाहर किए गए लगभग 47.57 लाख थे, लेकिन प्रश्न विशेष रूप से 'स्थानांतरित/अनुपस्थित' श्रेणी के बारे में है।
- Q3मध्यम
दिल्ली मतदाता सूची पुनरीक्षण मामले में निर्वाचन आयोग की कार्रवाई के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उठाई गई प्राथमिक चिंता क्या थी?
व्याख्या: लेख के अनुसार, मुख्य न्यायिक प्रश्न यह था कि मौजूदा मतदाताओं को, जो पहले सूची में थे और अब 'स्थानांतरित/अनुपस्थित' के रूप में चिह्नित हैं, नए मतदाताओं के रूप में क्यों माना जा रहा था और उन्हें फॉर्म-6 दाखिल करने के लिए मजबूर किया जा रहा था। यह प्रक्रियात्मक मुद्दा मुख्य चिंता थी, न कि केवल संख्या में कमी या समय।
7सभी स्रोत
मूल खबर28 अक्टूबर 2026 · खबर पढ़ें
