कर्नाटक सरकारी मुकदमेबाजी आचरण अधिनियम, 2023: उच्च न्यायालय ने अपीलों में राज्य की 466-1099 दिनों की देरी की आलोचना की
1खबर एक नज़र में
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सरकारी मुकदमेबाजी में देरी को रोकने के लिए बनाए गए अपने ही कानून का उल्लंघन करने के लिए राज्य सरकार की आलोचना की है। कर्नाटक सरकारी मुकदमेबाजी आचरण अधिनियम, 2023, अपीलों को समय पर दायर करना अनिवार्य करता है, लेकिन सरकार ने स्वयं 466 से 1,099 दिनों की देरी से अपीलें दायर कीं, जिसके कारण न्यायालय ने इसे 'लालफीताशाही द्वारा कानून को बाधित करने' का मामला बताया।
कानून बनाम व्यवहार
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उस विडंबना को उजागर किया जहाँ नौकरशाही की देरी को रोकने के लिए बनाया गया कानून स्वयं उन्हीं देरी से कमजोर हो रहा है।
भारी देरी
राज्य सरकार ने 466 दिनों से लेकर 1,099 दिनों तक की देरी से अपीलें दायर कीं, जो अनुमेय सीमा से कहीं अधिक है।
आदर्श वादी
न्यायालय ने जोर दिया कि राज्य से कानून के शासन को बनाए रखने वाला 'आदर्श वादी' होने की उम्मीद की जाती है, न कि 'विशेषाधिकार प्राप्त टालमटोल करने वाला'।
2याद रखने वाले तथ्य
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3विस्तृत विश्लेषण
संदर्भ / पृष्ठभूमि
सरकारें अक्सर सबसे बड़ी वादी होती हैं, और अपील दायर करने में देरी न्यायिक बैकलॉग में महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसे संबोधित करने के लिए, कर्नाटक विधानमंडल ने कर्नाटक सरकारी मुकदमेबाजी आचरण अधिनियम, 2023 अधिनियमित किया। यह अधिनियम सरकारी विभागों के लिए फाइलों को आगे बढ़ाने, राय मांगने और अपील दायर करने के लिए सख्त समय-सीमा निर्धारित करता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे जिम्मेदार वादी के रूप में कार्य करें। यह मामला अपने ही निर्माता द्वारा इस कानून के कार्यान्वयन का परीक्षण करता है।
मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ
उच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणियाँ एक महत्वपूर्ण शासन विफलता को रेखांकित करती हैं: कानून बनाने और कानून का पालन करने के बीच का अंतर। 'एक मेज से दूसरी मेज' तक फाइलों के चलने जैसे 'प्रशासनिक बहाने' का हवाला देकर, न्यायालय ने उन्हें भारी देरी को माफ करने के लिए अपर्याप्त कारण के रूप में खारिज कर दिया। यह निर्णय इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि राज्य अपने द्वारा बनाए गए कानूनों से छूट का दावा नहीं कर सकता है। यह एक मिसाल कायम करता है कि सरकारी मुकदमेबाजी को उसी अनुशासन के साथ संचालित किया जाना चाहिए जिसकी नागरिकों से अपेक्षा की जाती है, जो सरकारी जवाबदेही के उद्देश्य से अन्य राज्यों में समान कानूनों को प्रभावित करेगा।
भविष्य की संभावना / आगे का रास्ता
यह निर्णय कर्नाटक सरकार को मुकदमेबाजी के लिए अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए मजबूर करेगा। इससे अधिनियम के तहत नामित नोडल अधिकारियों द्वारा समय-सीमा की सख्त निगरानी हो सकती है। समान कानून वाले अन्य राज्य भी इस पर ध्यान देंगे। देरी को माफ करने से न्यायालय के इनकार से पता चलता है कि सामान्य नौकरशाही देरी पर आधारित भविष्य के आवेदनों को खारिज कर दिया जाएगा, जिससे ऐसे सुशासन कानूनों के इरादे को साकार करने के लिए प्रणालीगत प्रशासनिक सुधारों को बढ़ावा मिलेगा।
4पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी
- परिसीमन अवधि
- कानून द्वारा निर्धारित समय-सीमा जिसके भीतर एक कानूनी कार्यवाही (जैसे अपील) शुरू की जानी चाहिए। इस अवधि के समाप्त होने के बाद, कार्यवाही शुरू करने का अधिकार आम तौर पर समाप्त हो जाता है।
- आदर्श वादी
- एक सिद्धांत जो सरकार से, मुकदमेबाजी के एक पक्ष के रूप में, निष्पक्षता, स्पष्टवादिता और दक्षता के साथ कार्य करने की अपेक्षा करता है, दूसरों के लिए एक उदाहरण स्थापित करता है और देरी या कठिनाई पैदा करने के लिए अपनी विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति का उपयोग नहीं करता है।
- लालफीताशाही
- अत्यधिक नौकरशाही या आधिकारिक नियमों और औपचारिकताओं का पालन जिसके परिणामस्वरूप प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अनावश्यक और निराशाजनक देरी होती है।
5परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- डेटा: सरकारी अपीलों में 466 से 1,099 दिनों की देरी।
- नोडल निकाय: कर्नाटक उच्च न्यायालय (खंडपीठ)।
- कानूनी बिंदु: कर्नाटक सरकारी मुकदमेबाजी आचरण अधिनियम, 2023।
गलती मत करना!
वे 'कर्नाटक उच्च न्यायालय' के बजाय 'सर्वोच्च न्यायालय' द्वारा इन टिप्पणियों के बारे में पूछ सकते हैं, या अधिनियम के वर्ष (2023 को 2022 के साथ) को भ्रमित कर सकते हैं। वे अधिनियम के उद्देश्य को 'सरकारी मुकदमेबाजी बढ़ाने' के बजाय 'सरकारी मुकदमेबाजी में देरी को रोकने' के रूप में भी पूछ सकते हैं।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें
शासन घाटा, कानून का अक्षरशः पालन बनाम मूल भावना, जिम्मेदार वादी, नौकरशाही जड़ता, जवाबदेही के लिए न्यायिक सक्रियता
6अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1आसान
सरकारी अपीलों में देरी के संबंध में टिप्पणियाँ किस उच्च न्यायालय द्वारा की गईं?
व्याख्या: लेख स्पष्ट रूप से बताता है कि टिप्पणियाँ कर्नाटक के उच्च न्यायालय द्वारा की गईं, विशेष रूप से न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना और हेमा कुलकर्णी की खंडपीठ द्वारा।
- Q2कठिन
समाचार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.कर्नाटक सरकारी मुकदमेबाजी आचरण अधिनियम, 2023, सरकारी अधिकारियों के लिए अपील दायर करने के लिए सख्त समय-सीमा अनिवार्य करता है।
- 2.उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा अपील दायर करने में 200 से 500 दिनों तक की देरी देखी।
- 3.न्यायालय ने देरी के लिए सरकार के स्पष्टीकरणों को 'प्रशासनिक बहाने' करार दिया और उन्हें माफ करने से इनकार कर दिया।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 सही है क्योंकि अधिनियम यह निर्धारित करता है कि अधिकारियों को परिसीमन अवधि का पालन करना चाहिए। कथन 2 गलत है; देखी गई देरी 466 से 1,099 दिनों तक थी, न कि 200-500 दिनों तक। कथन 3 सही है क्योंकि पीठ ने स्पष्टीकरणों को 'प्रशासनिक बहानों का एक संग्रह' कहा और देरी को माफ नहीं किया।
- Q3मध्यम
समाचार के अनुसार, कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार की अपील दायर करने में देखी गई देरी की सीमा क्या थी?
व्याख्या: लेख स्पष्ट रूप से कहता है: 'निर्णयों के खिलाफ अपील दायर करने में 466 दिनों से 1,099 दिनों तक की देरी को देखते हुए...'। अन्य विकल्प अलग-अलग सीमाओं वाले भ्रमित करने वाले विकल्प हैं।
- Q4मध्यम
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणियों में मुख्य विडंबना क्या उजागर की?
व्याख्या: न्यायालय द्वारा उद्धृत मुख्य विडंबना यह है कि 'राज्य ने लालफीताशाही को रोकने के लिए एक कानून बनाया, लेकिन लालफीताशाही ने इस कानून के संचालन को ही रोक दिया है।' यह सीधे विकल्प B से मेल खाता है। अन्य विकल्प लेख द्वारा समर्थित नहीं हैं।
7सभी स्रोत
मूल खबर28 अक्टूबर 2026 · खबर पढ़ें
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SIR का पूर्ण रूप: विशेष गहन पुनरीक्षण
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