UAPA के तहत विदेशियों को ज़मानत: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया, कानूनी प्रवेश पर रोक नहीं

28 अक्टूबर 2026Hindustan2 मिनट4 प्रश्न

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1खबर एक नज़र में

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत विदेशी नागरिकों को ज़मानत देने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी विदेशी का भारत में प्रवेश कानूनी और अधिकृत था, तो UAPA की धारा 43D(7) के तहत कड़ी ज़मानत शर्तें अपने आप लागू नहीं होती हैं। अवैध प्रवेश साबित करने का बोझ अभियोजन पक्ष पर होगा।

  • ज़मानत स्पष्टीकरण

    सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि भारत में विदेशी नागरिकों का प्रवेश कानूनी था, तो UAPA के तहत उन्हें ज़मानत से वंचित नहीं किया जा सकता है।

  • सबूत का बोझ

    न्यायालय ने फैसला सुनाया कि कड़ी UAPA ज़मानत शर्तें तभी लागू होंगी जब अभियोजन पक्ष यह साबित करेगा कि आरोपी विदेशी का प्रवेश अवैध था।

  • कानूनी मिसाल

    यह फैसला मद्रास उच्च न्यायालय के एक आदेश को बरकरार रखता है और UAPA की धारा 43D(7) के आवेदन की व्याख्या करता है।

2याद रखने वाले तथ्य

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3विस्तृत विश्लेषण

संदर्भ / पृष्ठभूमि

गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) भारत का प्राथमिक आतंकवाद विरोधी कानून है, जो धारा 43D के तहत अपने कड़े ज़मानत प्रावधानों के लिए जाना जाता है। यह धारा आरोपियों के लिए ज़मानत हासिल करना मुश्किल बनाती है, खासकर उन मामलों में जहां न्यायालय का मानना है कि आरोपों के प्रथम दृष्टया सच होने के उचित आधार हैं। इस मामले में एक श्रीलंकाई नागरिक मोहम्मद रिफास शामिल था, जिस पर धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप था।

मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्थापित करता है। यह स्पष्ट करता है कि UAPA की धारा 43D(7) के कठोर ज़मानत प्रतिबंध विदेशियों के लिए पूर्ण बाधा नहीं हैं। मुख्य निर्धारक उनके प्रवेश की वैधता है। यदि अभियोजन पक्ष, इस मामले में NIA, यह सबूत देने में विफल रहता है कि प्रवेश अवैध या अनधिकृत था, तो न्यायालय ज़मानत पर विचार कर सकता है। यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को मौलिक अधिकारों के साथ संतुलित करता है, यह सुनिश्चित करता है कि कड़े कानून को उन विदेशियों के खिलाफ मनमाने ढंग से लागू न किया जाए जो कानूनी रूप से भारत में प्रवेश कर चुके थे लेकिन अपने वीज़ा की अवधि से अधिक समय तक रुके रहे।

भविष्य की संभावनाएं / आगे का रास्ता

यह फैसला UAPA के तहत विदेशी नागरिकों से जुड़े भविष्य के मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है। यह NIA जैसी जांच एजेंसियों को आरोपी के प्रवेश की अवैधता को सावधानीपूर्वक दस्तावेज़ीकृत और साबित करने का निर्देश देता है। यह निर्णय ज़मानत सुनवाई में अधिक सूक्ष्म कानूनी तर्कों को जन्म दे सकता है और अन्य कड़े कानूनों में समान व्याख्याओं को प्रभावित कर सकता है। यह संवैधानिक अधिकारों के ढांचे के भीतर आतंकवाद विरोधी कानूनों की व्याख्या करने में न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करता है।

4पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी

गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967
एक भारतीय कानून जिसका उद्देश्य गैरकानूनी गतिविधियों और आतंकवादी कृत्यों को रोकना है। यह सरकार को व्यक्तियों और संगठनों को आतंकवादी के रूप में नामित करने की शक्ति देता है और इसमें ज़मानत, इकबालिया बयान और हिरासत के संबंध में कड़े प्रावधान हैं।
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA)
मुंबई हमलों के बाद 2008 में स्थापित एक संघीय एजेंसी, जिसे राज्यों से विशेष अनुमति की आवश्यकता के बिना पूरे भारत में आतंकवाद से संबंधित अपराधों की जांच करने का काम सौंपा गया है।
संविधान का अनुच्छेद 21
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। इस अनुच्छेद की न्यायिक व्याख्याएं अक्सर UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत भी ज़मानत और निष्पक्ष सुनवाई पर निर्णयों का आधार बनती हैं।

5परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • कानूनी बिंदु: गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43D(7)।
  • संस्था: राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) अभियोजन निकाय के रूप में।
  • न्यायिक सिद्धांत: UAPA के तहत विदेशियों के लिए ज़मानत अनुमेय है यदि उनका प्रवेश कानूनी था; अवैध प्रवेश साबित करने का बोझ अभियोजन पक्ष पर है।

गलती मत करना!

परीक्षक यह कहकर फैसले को भ्रमित कर सकता है कि 'UAPA सभी विदेशी नागरिकों के लिए ज़मानत पर रोक लगाता है' या सबूत के बोझ को बदल सकता है, यह सुझाव दे सकता है कि आरोपी को कानूनी प्रवेश साबित करना होगा। सही स्थिति यह है कि अभियोजन पक्ष को अवैध प्रवेश साबित करना होगा।

मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें

राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का न्यायिक संतुलनज़मानत प्रावधानों की सख्त व्याख्याआतंकवाद जांच में NIA की भूमिका

6अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में चर्चित UAPA मामले में अभियोजन निकाय कौन सी केंद्रीय एजेंसी थी?

  2. Q2कठिन

    UAPA के तहत विदेशियों के लिए ज़मानत पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.न्यायालय ने फैसला सुनाया कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम विदेशी नागरिकों के लिए ज़मानत पर पूरी तरह से रोक लगाता है।
    2. 2.यह फैसला विदेशी आरोपी के अवैध प्रवेश को साबित करने का बोझ अभियोजन पक्ष पर डालता है।
    3. 3.सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में दिसंबर 2023 के मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3मध्यम

    समाचार लेख के अनुसार, मद्रास उच्च न्यायालय ने किस तारीख को वह आदेश पारित किया था जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने इस UAPA ज़मानत मामले में बरकरार रखा था?

  4. Q4मध्यम

    UAPA के तहत विदेशियों के लिए ज़मानत पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का प्राथमिक कानूनी महत्व क्या है?

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सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल विदेशी नागरिक होना गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत ज़मानत से इनकार करने का आधार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि धारा 43D(7) के तहत ज़मानत से इनकार के लिए, अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने भारत में अवैध रूप से प्रवेश किया था, साथ ही उस पर UAPA के तहत आरोप भी हों और वह गैर-नागरिक हो।

UAPA का पूर्ण रूप: गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम

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गणना में लापरवाही पर 13 करोड़ मतदाताओं को सूची से हटाने की निर्वाचन आयोग की शक्ति पर सर्वोच्च न्यायालय ने उठाए सवाल

सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान गणना प्रपत्र वापस न करने पर मतदाताओं को स्थायी रूप से मतदाता सूची से हटाने के भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के अधिकार पर सवाल उठाया है। न्यायालय ने मतदान के अधिकार के संवैधानिक महत्व पर ज़ोर दिया और निर्वाचन आयोग को सरल उपाय तलाशने का निर्देश दिया, जिससे देश भर में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं की स्थिति प्रभावित होगी।

मुख्य तिथि: 28 अक्टूबर, 2026

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भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का सर्वोच्च न्यायालय में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर हलफनामा, पारदर्शिता संबंधी चिंताएं बढ़ाता है

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान अपने कामकाज का बचाव करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर किया, लेकिन इसने आंतरिक असहमति और पारदर्शिता से संबंधित प्रमुख सवालों के जवाब नहीं दिए। यह संवैधानिक निकाय के भीतर नियंत्रण और संतुलन के क्षरण के बारे में गंभीर मुद्दे उठाता है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। उम्मीदवारों को ECI की स्वायत्तता के लिए संस्थागत चुनौतियों और अनुच्छेद 324 की भूमिका को समझना चाहिए।

संवैधानिक निकाय: भारत निर्वाचन आयोग (ECI)

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सर्वोच्च न्यायालय ECI की निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच करेगा, 2023 के अधिनियम के अनुच्छेद 324 और धारा 18 के तहत सर्वसम्मति की पड़ताल करेगा।

यह न्यायिक पड़ताल अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक अधिकार और भारत के स्वतंत्र चुनाव निकाय की कार्यात्मक अखंडता से संबंधित है।

ECI का पूर्ण रूप: भारत निर्वाचन आयोग

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Indian Express
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डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023: प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर मीडिया घरानों ने धारा 7, 17(2), 36, 37, 44(3) को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA), जो 21 प्रमुख मीडिया घरानों का प्रतिनिधित्व करता है, ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 (DPDP एक्ट) के प्रमुख प्रावधानों को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है। उनका तर्क है कि पत्रकारिता गतिविधियों के लिए कानून में विशिष्ट छूट न होने और डेटा प्रोसेसिंग के लिए पूर्व सहमति लेने की अनिवार्यता से पूर्व-सेंसरशिप हो सकती है और खोजी पत्रकारिता गंभीर रूप से बाधित हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होगी।

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HindustanIndian Express2 स्रोत
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सर्वोच्च न्यायालय ने दवा मूल्य नियंत्रण के प्रति सरकार के 'कैलिब्रेटेड' दृष्टिकोण पर सवाल उठाया है। न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आर्थिक नीति नागरिकों के सस्ती स्वास्थ्य सेवा के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकती। इसने आवश्यक दवाओं पर व्यापार मार्जिन तय करने में देरी के लिए राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की जांच की और फार्मा कंपनियों से अधिक शुल्क लेने के लिए लंबित पड़ी भारी वसूली का मुद्दा उठाया।

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