सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमों का संकट: 96,000 से अधिक मामले लंबित, 80% विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) से; 2026 में 38 न्यायाधीश स्वीकृत
किस परीक्षा के लिए कितनी ज़रूरी
- UPSC8/10
1खबर एक नज़र में
भारत का सर्वोच्च न्यायालय 96,000 से अधिक लंबित मामलों के साथ एक गंभीर कार्यभार संकट का सामना कर रहा है। नए दायर होने वाले मामलों में से लगभग 80% विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) हैं। मई 2026 में स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी गई थी, लेकिन मुख्य मुद्दा SLP की उच्च स्वीकृति दर बनी हुई है। SLP को मूल रूप से एक विवेकाधीन अंतिम उपाय के रूप में बनाया गया था, लेकिन इसने सर्वोच्च न्यायालय को अपील के एक नियमित न्यायालय में बदल दिया है।
कार्यभार संकट
सर्वोच्च न्यायालय में 38 न्यायाधीशों के साथ 96,000 से अधिक मामले लंबित हैं, प्रति न्यायाधीश औसतन 2,500 मामले हैं। यह एक गंभीर न्यायिक बैकलॉग को दर्शाता है।
SLP का प्रभुत्व
संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) अब नए दायर होने वाले मामलों का लगभग 80% हैं, जिससे न्यायालय की भूमिका संवैधानिक संरक्षक से एक नियमित अपीलीय निकाय में बदल गई है।
सुधार की दुविधा
मुख्य चुनौती न्याय तक पहुंच को प्रतिबंधित किए बिना SLP प्रवेश मानदंडों में सुधार करना है, क्योंकि न्यायालय अपनी विवेकाधीन शक्ति को प्रबंधनीय कार्यभार के साथ संतुलित करता है।
2याद रखने वाले तथ्य
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3विस्तृत विश्लेषण
संदर्भ / पृष्ठभूमि
संविधान का अनुच्छेद 136 सर्वोच्च न्यायालय को भारत के किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा पारित या किए गए किसी भी निर्णय, डिक्री, निर्धारण, सजा या आदेश से अपील करने के लिए विशेष अनुमति प्रदान करता है। इसे न्याय के शाही विशेषाधिकार के विकल्प के रूप में तैयार किया गया था और इसका उद्देश्य एक विवेकाधीन, असाधारण उपाय था। हालांकि, दशकों से, SLP न्यायालय तक पहुंचने का प्राथमिक तरीका बन गया है, जो इसके कार्यभार का लगभग 80% है। इससे 96,000 से अधिक लंबित मामलों का एक अस्थिर कार्यभार हो गया है।
मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ
SLP का भारी प्रवाह, जिनमें से कई में उल्लिखित 9 साल पुराने UPPCL विवाद मामले जैसे तुच्छ मामले शामिल हैं, न्यायालय का समय उसके प्राथमिक संवैधानिक कार्यों से हटा देता है। अमेरिका (हजारों में से 70-80 की सुनवाई) और यूके (2025-26 में 207 में से 45) के सर्वोच्च न्यायालयों की तुलना में, भारत का सर्वोच्च न्यायालय सालाना कई हजार मामलों को स्वीकार करता है। यह इसे 'नज़ीर के न्यायालय' के बजाय 'त्रुटि सुधार के न्यायालय' में बदल देता है, जिससे संविधान के अंतिम व्याख्याकार के रूप में इसकी भूमिका कमजोर होती है।
भविष्य की संभावनाएं / आगे का रास्ता
लेख SLP प्रवेश के लिए एक 'संहिताबद्ध फिल्टर' या व्यापक दिशानिर्देशों की आवश्यकता बताता है। न्यायालय ने स्वयं 2010 में इस सुझाव को स्वीकार किया था, लेकिन बाद में एक संविधान पीठ ने इसे लागू करने से इनकार कर दिया। संवैधानिक और अपीलीय पीठों को अलग करना या क्षेत्रीय SC पीठों का निर्माण जैसे दीर्घकालिक समाधान लक्षणों को संबोधित करते हैं, न कि मूल कारण को। अनसुलझा तनाव अनुच्छेद 136 के तहत न्याय तक व्यापक पहुंच को बनाए रखने और न्यायालय की स्थिरता तथा राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर ध्यान केंद्रित करने के बीच है।
4पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी
- संविधान का अनुच्छेद 136
- सर्वोच्च न्यायालय को भारत के क्षेत्र में किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा पारित या किए गए किसी भी निर्णय, डिक्री, निर्धारण, सजा या आदेश से अपील करने के लिए विशेष अनुमति प्रदान करता है। यह एक विवेकाधीन शक्ति है।
- विशेष अनुमति याचिका (SLP)
- अनुच्छेद 136 के तहत दायर एक याचिका जिसमें किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण के आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की विशेष अनुमति मांगी जाती है। अनुमति देना न्यायालय के विवेक पर है।
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG)
- भारत भर के न्यायालयों में दायर मामलों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस। यह न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता को बढ़ावा देते हुए मामले की लंबितता और निपटान दरों पर वास्तविक समय डेटा प्रदान करता है।
- संविधान पीठ
- सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ जिसमें पांच या अधिक न्यायाधीश होते हैं, जो संविधान की व्याख्या से संबंधित कानून के महत्वपूर्ण प्रश्नों का निर्णय करने के लिए गठित की जाती है।
5परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- डेटा: सर्वोच्च न्यायालय में 96,000 से अधिक लंबित मामले; ~80% नए दायर मामले SLP हैं।
- नोडल निकाय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय; राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG)।
- कानूनी बिंदु: संविधान का अनुच्छेद 136 - सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील करने के लिए विशेष अनुमति।
गलती मत करना!
अनुच्छेद 136 के उद्देश्य (विवेकाधीन, असाधारण उपाय) को अपील के अधिकार के साथ भ्रमित करना, या SLP के प्रतिशत (80%) को कुल लंबित मामलों या न्यायाधीशों की संख्या के साथ बदलना।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें
न्यायिक बैकलॉगसर्वोच्च न्यायालय का 'नियमित अपील न्यायालय' में परिवर्तनविवेकाधीन क्षेत्राधिकार बनाम न्याय तक पहुंचतुलनात्मक न्यायिक दक्षता
6अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1कठिन
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के कार्यभार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.लेख के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय में वर्तमान में 38 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या है, जिसे मई 2026 में 34 से बढ़ाया गया था।
- 2.सर्वोच्च न्यायालय में नए दायर होने वाले मामलों में विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) लगभग 50% हैं।
- 3.राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) भारतीय न्यायालयों में लंबित मामलों के डेटा का स्रोत है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 सही है: लेख में कहा गया है कि मई 2026 में स्वीकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 न्यायाधीश कर दी गई थी। कथन 2 गलत है: लेख में उल्लेख है कि SLP नए दायर होने वाले मामलों का लगभग 80% है, न कि 50%। कथन 3 सही है: लेख राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) से नवीनतम उपलब्ध डेटा का हवाला देता है। अतः विकल्प C सही है।
- Q2मध्यम
लेख में दिए गए विश्लेषण के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय में नए दायर होने वाले मामलों में विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) का अनुमानित प्रतिशत कितना है?
व्याख्या: लेख स्पष्ट रूप से कहता है कि विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) सर्वोच्च न्यायालय में दायर होने वाले मामलों की प्रमुख श्रेणी हैं। कुछ अनुमानों से पता चलता है कि वे नए दायर होने वाले मामलों का लगभग 80 प्रतिशत हैं। अन्य विकल्प संभावित भ्रामक हैं लेकिन स्रोत में दिए गए आंकड़े से मेल नहीं खाते हैं।
- Q3मध्यम
लेख में विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के कार्यभार प्रबंधन में सुधार में एक प्रमुख अनसुलझी चुनौती के रूप में क्या पहचाना गया है?
व्याख्या: लेख का निष्कर्ष है कि मुख्य कठिनाई समस्या की पहचान की कमी नहीं है, बल्कि न्यायालय के कार्यों को प्रभावी ढंग से सीमित करने के तरीके पर समझौते का अभाव है। यह कार्यभार को कम करने के लिए एक 'संहिताबद्ध फिल्टर' बनाने और अनुच्छेद 136 के तहत अपनी विवेकाधीन शक्ति को प्रतिबंधित करने के लिए न्यायालय की ऐतिहासिक अनिच्छा के बीच तनाव को उजागर करता है, इस डर से कि यह न्याय के हितों के खिलाफ काम करेगा।
7सभी स्रोत
मूल खबर26 अक्टूबर 2026 · खबर पढ़ें
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2 स्रोतकैबिनेट सचिव: भूमिकाएं, संवैधानिक सीमाएं और भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता
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