प्रिलिम्स के लिए: पेटेंट, CSIR-NEERI, नेट-ज़ीरो उत्सर्जन, कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), उत्पाद का नाम, कच्चा माल, हर साल बचने वाले पेड़, हर साल रोका गया CO₂ उत्सर्जन
मेन्स के लिए: अपशिष्ट से संपदा नवाचार, चक्रीय अर्थव्यवस्था, पर्यावरणीय स्थिरता, पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान का समन्वय
स्रोत:Dainik Bhaskar
वन-डे परीक्षा के 5 तथ्य
SSC, रेलवे, पुलिस और शिक्षक भर्ती में ऐसे ही सीधे सवाल आते हैं।
- गोमय समिधा गोबर, पराली और हवन सामग्री से बना पेटेंट प्राप्त जैव-ईंधन है।
- यह हर साल 2 करोड़ पेड़ बचाता है और 90 लाख टन CO₂ उत्सर्जन रोकता है।
- CSIR-NEERI ने श्मशान घाटों के लिए नेट-ज़ीरो चिमनी विकसित करने में साझेदारी की है।
- पेटेंट उत्पाद और उसकी निर्माण प्रक्रिया दोनों को कवर करता है।
- इस पहल को NIAM के माध्यम से ₹15 लाख का केंद्रीय अनुदान मिला है।
चर्चा में क्यों?
गोबर और पराली से बना 'गोमय समिधा' नाम का पेटेंट प्राप्त जैव-ईंधन श्मशान में लकड़ी का विकल्प देता है, जिससे हर साल 2 करोड़ पेड़ बच सकते हैं और 90 लाख टन CO₂ उत्सर्जन रुक सकता है। CSIR-NEERI और MNIT जयपुर के सहयोग से यह पर्यावरण संरक्षण को पारंपरिक रीति-रिवाजों से जोड़ता है।
सारांश
- गोमय समिधा गोबर, पराली और वैदिक हवन सामग्री से बना पेटेंट प्राप्त ईंधन है, जो श्मशान में लकड़ी की जगह लेता है और हर साल 2 करोड़ पेड़ बचाता है।
- अनुमान है कि इस नवाचार से हर साल 90 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोका जा सकेगा।
- CSIR-NEERI ने नेट-ज़ीरो चिमनी फिल्टर विकसित करने में साझेदारी की है, जो अंतिम संस्कार के दौरान राख और कार्बन कणों को सोखती है।
मुख्य बातें
गोमय समिधा का पेटेंट
गोबर और पराली से बने जैव-ईंधन को श्मशान में लकड़ी के विकल्प के रूप में राष्ट्रीय पेटेंट मिला है।
हर साल 2 करोड़ पेड़ बचेंगे
इस नवाचार का उद्देश्य अंतिम संस्कार के लिए हर साल कटने वाले 2 करोड़ पेड़ बचाना है।
CSIR-NEERI की नेट-ज़ीरो चिमनी
CSIR-NEERI के साथ मिलकर बनी एक विशेष फिल्टर चिमनी राख और कार्बन कणों को सोखती है, जिससे उत्सर्जन नेट-ज़ीरो हो जाता है।
पृष्ठभूमि
पारंपरिक हिंदू अंतिम संस्कार में प्रति चिता 400-500 किलो लकड़ी जलती है, जिससे बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन होता है। कोविड-19 संकट के दौरान लकड़ी की कमी से नदियों में शव बहाने पड़े, जिससे टिकाऊ विकल्प की ज़रूरत साफ़ हुई। जयपुर के डॉ. सीताराम गुप्ता और अदिति गुप्ता ने पर्यावरणीय और धार्मिक दोनों ज़रूरतों को ध्यान में रखकर गोमय समिधा विकसित की।
प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव
पेटेंट उत्पाद और उसकी प्रक्रिया दोनों को कवर करता है, इसलिए यह कानूनी रूप से संरक्षित नवाचार है। हर साल 2 करोड़ पेड़ बचने और 90 लाख टन CO₂ उत्सर्जन रुकने से पर्यावरणीय प्रभाव बड़ा है। नेट-ज़ीरो चिमनी के लिए CSIR-NEERI के साथ साझेदारी तकनीकी परत जोड़ती है, जो बची हुई राख और कार्बन को रोककर श्मशान घाटों के वायु प्रदूषण पर काम करती है। जयपुर नगर निगम के साथ MoU के तहत जयपुर के 11 मोक्षधामों में इस मॉडल का पायलट चल चुका है, जहां हज़ारों निशुल्क अंतिम संस्कार हो चुके हैं।
आगे की राह
NIAM से ₹15 लाख की केंद्रीय सहायता के साथ यह पहल दूसरे शहरों तक फैल सकती है। पूरे भारत में व्यापक अपनाने से वनों की कटाई काफ़ी घट सकती है और शहरी क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता सुधर सकती है। गोमय फाउंडेशन इस मॉडल को और नगर निगमों तक ले जाने का लक्ष्य रखता है, जिससे कृषि अपशिष्ट (पराली) और पशुधन उत्पाद (गोबर) पर आधारित चक्रीय अर्थव्यवस्था बन सकती है।
राजस्थान से जुड़ाव
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पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं
- पेटेंट
- सरकारी प्राधिकरण द्वारा आविष्कारक या उसके उत्तराधिकारी को दिया गया एक विशेष अधिकार, जिसके तहत निर्दिष्ट अवधि के लिए आविष्कार को बनाने, उपयोग करने या बेचने का अधिकार केवल उसी के पास होता है और दूसरे बिना अनुमति ऐसा नहीं कर सकते।
- CSIR-NEERI
- राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक घटक प्रयोगशाला है, जिसका मुख्यालय नागपुर में है और जो पर्यावरण विज्ञान व अभियांत्रिकी पर काम करती है।
- नेट-ज़ीरो उत्सर्जन
- वह स्थिति जिसमें वायुमंडल में छोड़ी गई ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा उतनी ही मात्रा में हटाई या अवशोषित की गई गैसों से संतुलित हो, जिससे वायुमंडल में उनके सांद्रण में शुद्ध वृद्धि न हो।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
- जीवाश्म ईंधन और बायोमास जलाने से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैस; यह जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है। 90 लाख टन CO₂ लगभग उतना है जितना सैकड़ों हज़ार वाहनों का सालाना उत्सर्जन होता है।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य
पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर उत्तर देखने के लिए कार्ड पर क्लिक करें।
परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- लक्ष्य यह उत्पाद: गोमय समिधा, अंतिम संस्कार के लिए गोबर और पराली से बना पेटेंट प्राप्त जैव-ईंधन।
- लक्ष्य यह आँकड़ा: हर साल 2 करोड़ पेड़ बचने और 90 लाख टन CO₂ उत्सर्जन रुकने का।
- लक्ष्य यह नोडल निकाय: CSIR-NEERI (नागपुर), जिसने नेट-ज़ीरो चिमनी तकनीक में साझेदारी की।
- लक्ष्य यह अनुदान: NIAM के माध्यम से केंद्र सरकार से ₹15 लाख।
यह गलती न करें!
परीक्षक 'गोमय समिधा' को गोबर से बने दूसरे उत्पादों (जैसे गोमय कंडे, गोबर से बना बायो-CNG) के साथ उलझा सकते हैं। वे CO₂ बचत के आँकड़े भी बदल सकते हैं या पेटेंट को किसी दूसरे मंत्रालय से जोड़ सकते हैं। याद रखें: पेटेंट उत्पाद और प्रक्रिया दोनों के लिए है, और मुख्य साझेदार CSIR-NEERI है, ISRO या DRDO नहीं।
मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु
- अपशिष्ट से संपदा नवाचार, चक्रीय अर्थव्यवस्था, पर्यावरणीय स्थिरता, पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान का समन्वय
कहीं अटके? एक टैप में समझें
गोमय समिधा गोबर और पराली से बनी ईंधन ईंट है, जो लकड़ी की तरह जलती है। अंतिम संस्कार में लकड़ी की जगह इसका उपयोग होता है, इसलिए कम पेड़ काटने पड़ते हैं। CSIR-NEERI के साथ बनी विशेष चिमनी धुआं और राख को रोकती है, जिससे प्रक्रिया लगभग प्रदूषण-मुक्त हो जाती है। इसे ऐसे समझें जैसे चूल्हे में लकड़ी की जगह रीसाइकल किए गए गत्ते के लॉग का इस्तेमाल करना।
- गोमय समिधा गोबर, पराली और हवन सामग्री से बना पेटेंट प्राप्त जैव-ईंधन है।
- यह हर साल 2 करोड़ पेड़ बचाता है और 90 लाख टन CO₂ उत्सर्जन रोकता है।
- CSIR-NEERI ने श्मशान घाटों के लिए नेट-ज़ीरो चिमनी विकसित करने में साझेदारी की है।
- पेटेंट उत्पाद और उसकी निर्माण प्रक्रिया दोनों को कवर करता है।
- इस पहल को NIAM के माध्यम से ₹15 लाख का केंद्रीय अनुदान मिला है।
- पर्यावरण: अपशिष्ट प्रबंधन और चक्रीय अर्थव्यवस्था
- विज्ञान और प्रौद्योगिकी: नवाचार और पेटेंट
जुड़ी अवधारणाएँ: पेटेंट, CSIR-NEERI, नेट-ज़ीरो उत्सर्जन, कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)
अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1मध्यम
गोमय समिधा आधारित अंतिम संस्कार के लिए नेट-ज़ीरो चिमनी विकसित करने में किस CSIR प्रयोगशाला ने साझेदारी की?
व्याख्या: CSIR-NEERI (राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान) ने गोमय फाउंडेशन के साथ मिलकर राख और कार्बन कणों को सोखने वाली विशेष फिल्टर चिमनी डिज़ाइन करने में साझेदारी की। CSIR-CEERI एक अलग प्रयोगशाला है (केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान), और बाकी विकल्प इस परियोजना में शामिल नहीं हैं।
- Q2कठिन
गोमय समिधा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.गोमय समिधा गोबर, पराली और वैदिक हवन सामग्री से बना एक पेटेंट प्राप्त जैव-ईंधन है।
- 2.पेटेंट केवल उत्पाद को कवर करता है, निर्माण प्रक्रिया को नहीं।
- 3.इस पहल का पायलट जयपुर में नगर निगम के साथ MoU के तहत 11 श्मशान घाटों में चलाया गया है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 सही है क्योंकि गोमय समिधा गोबर, पराली और हवन सामग्री से बनती है। कथन 2 गलत है क्योंकि पेटेंट उत्पाद और प्रक्रिया दोनों को कवर करता है। कथन 3 सही है क्योंकि जयपुर नगर निगम के साथ MoU के तहत जयपुर के 11 मोक्षधाम गोद लिए गए हैं। अतः विकल्प C सही है।
- Q3मध्यम
गोमय समिधा के बड़े पैमाने पर उपयोग से हर साल कितने टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोका जा सकेगा, ऐसा अनुमान है?
व्याख्या: इस नवाचार से हर साल 90 लाख टन (9 मिलियन टन) कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोका जाएगा। 9 लाख टन बहुत कम है, और करोड़ स्तर के आँकड़े स्रोत में समर्थित नहीं हैं।
- Q4मध्यम
गोमय समिधा को बड़े पैमाने पर अपनाने का मुख्य पर्यावरणीय लाभ क्या है?
व्याख्या: गोमय समिधा चिता में लकड़ी की जगह लेती है, जिससे हर साल सीधे 2 करोड़ पेड़ बचते हैं और 90 लाख टन CO₂ उत्सर्जन रुकता है। नेट-ज़ीरो चिमनी से वायु प्रदूषण घटता है, लेकिन सभी प्रदूषक समाप्त नहीं होते, और यह मुख्य रूप से जल प्रदूषण या बायोगैस उत्पादन पर काम नहीं करती।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. गोमय समिधा क्या है?
गोमय समिधा गोबर, पराली और वैदिक हवन सामग्री से बना पेटेंट प्राप्त जैव-ईंधन है, जिसे अंतिम संस्कार में लकड़ी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
2. गोमय समिधा हर साल कितने पेड़ बचाती है?
अनुमान है कि यह चिताओं में लकड़ी की जगह लेकर हर साल 2 करोड़ पेड़ बचाएगी।
3. नेट-ज़ीरो चिमनी के लिए किस संस्थान ने साझेदारी की?
CSIR-NEERI (राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान) ने नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने वाली विशेष फिल्टर चिमनी डिज़ाइन करने में साझेदारी की।
4. गोमय समिधा मॉडल का पहला पायलट कहाँ चलाया गया?
इसका पहला पायलट राजस्थान के जयपुर में, जयपुर नगर निगम के साथ MoU के तहत 11 मोक्षधामों (श्मशान घाटों) में चलाया गया।
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मूल खबर5 नवंबर 2026 · खबर पढ़ें

