राजव्यवस्था

झारखंड उच्च न्यायालय ने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के तहत ससुर की विधवा बहू के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी को बरकरार रखा

5 नवंबर 20262 मिनट1 स्रोत4 प्रश्नखबर 16 / 54

प्रिलिम्स के लिए: हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956, भरण-पोषण, आश्रित (हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के तहत), न्यायालय, पीठ, मुख्य अधिनियम, भरण-पोषण की राशि, ससुर की मासिक आय

मेन्स के लिए: धार्मिक कर्तव्य, कानूनी दायित्व, आश्रित विधवा, लैंगिक न्याय, व्यक्तिगत कानून

स्रोत:Indian ExpressIndian Express

चर्चा में क्यों?

झारखंड उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को सही ठहराया है, जिसमें 83 वर्षीय ससुर को अपनी विधवा बहू और उसके दो बेटों को हर महीने ₹17,000 भरण-पोषण देने को कहा गया था। अदालत ने कहा कि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के तहत हिंदू पर अपनी विधवा बहू और आश्रित पोते-पोतियों के भरण-पोषण का कानूनी दायित्व और धार्मिक कर्तव्य दोनों है, चाहे उसकी उम्र कुछ भी हो।

सारांश

  • झारखंड उच्च न्यायालय (मुख्य न्यायाधीश एम एस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद) ने पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें ससुर को विधवा बहू और उसके दो बेटों को ₹17,000 प्रति माह भरण-पोषण देने को कहा गया था।
  • अदालत ने कहा कि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के तहत हिंदू पर उस विधवा बहू के भरण-पोषण का कानूनी दायित्व और धार्मिक कर्तव्य है, जिसकी आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है।
  • अदालत ने कहा कि उम्र भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से मुक्ति नहीं देती। उसने इस अधिनियम की व्याख्या करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले पर भरोसा किया।

मुख्य बातें

  • कानूनी दायित्व बरकरार

    झारखंड उच्च न्यायालय ने कहा कि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के तहत ससुर का अपनी विधवा बहू और आश्रित पोते-पोतियों के भरण-पोषण का वैधानिक और धार्मिक कर्तव्य है।

  • आश्रितों की परिभाषा

    अधिनियम में आश्रितों में पहले मर चुके बेटे का नाबालिग बेटा और बेटे की विधवा (यदि वह दोबारा विवाह न करे) शामिल हैं। इसलिए वे ससुर से भरण-पोषण पाने की हकदार हैं।

  • उम्र बाधा नहीं

    अदालत ने कहा कि ससुर की उम्र से विधवा बहू और पोते-पोतियों के भरण-पोषण की धार्मिक ज़िम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।

पृष्ठभूमि

वर्ष 2020 में पति की मृत्यु के बाद दो बेटों वाली एक महिला ने अपने 83 वर्षीय ससुर से भरण-पोषण मांगा। ससुर के पास ₹32,000 की मासिक पेंशन, किराया आय और सावधि जमा थे, फिर भी उन्होंने सहायता देने से इनकार कर दिया। पारिवारिक न्यायालय ने उन्हें ₹17,000 प्रति माह देने का आदेश दिया, जिसे उन्होंने झारखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव

उच्च न्यायालय ने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम का हवाला देते हुए पुष्टि की कि विधवा बहू और पोते-पोतियों के भरण-पोषण का दायित्व कानूनी भी है और धार्मिक भी। अदालत ने उम्र के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि ससुर की ₹50,000 से अधिक की संयुक्त मासिक आय उनकी भुगतान क्षमता को दर्शाती है। यह फैसला हिंदू व्यक्तिगत कानून के दायरे में विधवा महिलाओं और आश्रित बच्चों के अधिकारों को मज़बूत करता है।

आगे की राह

यह फैसला हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के तहत ऐसे समान दावों के लिए मिसाल बनेगा, खासकर उन मामलों में जहां बेटे की पहले मृत्यु हो चुकी हो। यह स्पष्ट करता है कि यदि ससुर के पास आर्थिक साधन हैं, तो उम्र या निजी खर्च उसे अपने वैधानिक दायित्व से अपने आप मुक्त नहीं करते।

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पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं

हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
हिंदू व्यक्तिगत कानून, जो एक हिंदू के उन कुछ आश्रितों को भरण-पोषण देने के कानूनी दायित्व को नियंत्रित करता है, जिनमें विधवा बहू और पहले मर चुके बेटे के नाबालिग बच्चे शामिल हैं।
भरण-पोषण
किसी व्यक्ति द्वारा अपने आश्रितों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता, जिसमें भोजन, कपड़े, आवास, शिक्षा और चिकित्सा शामिल हैं। यह व्यक्तिगत कानूनों या वैधानिक प्रावधानों के तहत अनिवार्य होती है।
आश्रित (हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के तहत)
वह व्यक्ति जिसे किसी हिंदू से भरण-पोषण पाने का अधिकार है, जिसमें बेटे की विधवा (यदि वह दोबारा विवाह न करे) और पहले मर चुके बेटे का नाबालिग बेटा शामिल हैं।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

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परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • इस डेटा पर ध्यान दें: झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा बरकरार रखा गया ₹17,000 प्रति माह भरण-पोषण
  • इस नोडल निकाय पर ध्यान दें: झारखंड उच्च न्यायालय
  • इस कानूनी बिंदु पर ध्यान दें: हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956

यह गलती न करें!

वे सही 'हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम' की जगह 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम' या 'हिंदू विवाह अधिनियम' के बारे में पूछ सकते हैं। वे न्यायालय का नाम भी बदल सकते हैं, जैसे 'झारखंड उच्च न्यायालय' की जगह 'सर्वोच्च न्यायालय'।

मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु

  • धार्मिक कर्तव्य, कानूनी दायित्व, आश्रित विधवा, लैंगिक न्याय, व्यक्तिगत कानून

कहीं अटके? एक टैप में समझें

अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    झारखंड उच्च न्यायालय ने विधवा बहू के भरण-पोषण आदेश को सही ठहराने के लिए किस अधिनियम का हवाला दिया?

  2. Q2कठिन

    झारखंड उच्च न्यायालय के फैसले के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.अदालत ने माना कि ससुर का अपनी विधवा बहू और पोते-पोतियों के भरण-पोषण का धार्मिक कर्तव्य है।
    2. 2.अदालत ने कहा कि ससुर की उम्र उसे भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से अपने आप मुक्त कर देती है।
    3. 3.अदालत ने नोट किया कि ससुर की मासिक आय ₹50,000 से अधिक थी, जो उनकी भुगतान क्षमता स्थापित करती है।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3मध्यम

    इस मामले में झारखंड उच्च न्यायालय ने किस मासिक भरण-पोषण राशि को बरकरार रखा?

  4. Q4मध्यम

    झारखंड उच्च न्यायालय के इस फैसले द्वारा स्थापित मुख्य कानूनी सिद्धांत क्या है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. विधवा बहू के भरण-पोषण आदेश को किस न्यायालय ने बरकरार रखा?

मुख्य न्यायाधीश एम एस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की पीठ वाले झारखंड उच्च न्यायालय ने आदेश को बरकरार रखा।

2. कितना मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया?

ससुर को अपनी विधवा बहू और उसके दो बेटों को ₹17,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया गया।

3. भरण-पोषण आदेश किस अधिनियम के तहत पारित हुआ?

आदेश हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत पारित हुआ।

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