राजव्यवस्था

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) अध्याय IX: सुरक्षा कार्यवाही, बंधपत्र और 3 साल तक की निवारक हिरासत

29 अक्टूबर 20264 मिनट1 स्रोत4 प्रश्नखबर 25 / 67

प्रिलिम्स के लिए: कार्यपालक मजिस्ट्रेट (EM), बंधपत्र, प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR), उचित प्रतिबंध (अनुच्छेद 19), BNSS का पूर्ण रूप, किसकी जगह ली, नियंत्रक अध्याय, अधिकतम कारावास (धारा 129)

मेन्स के लिए: निवारक न्यायशास्त्र; अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताओं और अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन; प्रशासनिक विवेक बनाम न्यायिक सुरक्षा; सार्वजनिक शांति का सक्रिय रखरखाव

स्रोत:Indian Express

चर्चा में क्यों?

दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह लेने वाली भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को शांति भंग की संभावित घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा कार्यवाही शुरू करने का अधिकार देती है। ये कार्यवाही व्यक्तियों को शांति या अच्छे व्यवहार बनाए रखने के लिए बंधपत्र (ज़मानत के साथ या उसके बिना) निष्पादित करने के लिए बाध्य कर सकती हैं, जिसका पालन न करने पर 3 साल तक की कैद हो सकती है।

सारांश

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) का अध्याय IX शांति भंग होने से पहले उसे रोकने के लिए निवारक सुरक्षा कार्यवाही का प्रावधान करता है, जो आपराधिक FIR से अलग है।
  • कार्यपालक मजिस्ट्रेट (या कमिश्नरेट प्रणाली में पुलिस आयुक्त/विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट) धारा 126-129 के तहत कार्यवाही शुरू कर सकते हैं, जिसमें शांति या अच्छे व्यवहार के लिए बंधपत्र की आवश्यकता होती है, जिसकी जांच अवधि अधिकतम 6 महीने होती है।
  • मुख्य सुरक्षा उपायों में अनिवार्य प्रारंभिक आदेश, जांच और अपील शामिल हैं। सर्वोच्च न्यायालय (मधु लिमये मामले) ने सार्वजनिक व्यवस्था के लिए अनुच्छेद 19 के तहत इन प्रावधानों को उचित प्रतिबंधों के रूप में बरकरार रखा है।

मुख्य बातें

  • निवारक सुरक्षा

    BNSS का अध्याय IX कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को शांति भंग होने की संभावित घटनाओं को रोकने के लिए बंधपत्र का आदेश देने की अनुमति देता है, जो अपराध के बाद की FIR से अलग है।

  • समय-सीमा और सीमाएं

    सुरक्षा कार्यवाही की जांच 6 महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए, ऐसा न होने पर वे स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

  • संवैधानिक वैधता

    सर्वोच्च न्यायालय ने मधु लिमये मामले में इन प्रावधानों को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए अनुच्छेद 19 के तहत उचित प्रतिबंधों के रूप में बरकरार रखा।

संदर्भ / पृष्ठभूमि

BNSS 2023 उन तीन नए आपराधिक कानूनों में से एक है जो औपनिवेशिक काल के भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह ले रहे हैं। सुरक्षा कार्यवाही पर अध्याय IX CrPC से निवारक न्यायशास्त्र की निरंतरता और परिष्करण है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था का सक्रिय रखरखाव है, जो संविधान के तहत एक प्रमुख राज्य कार्य है।

मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ

यह कानून एक दोहरी प्रणाली बनाता है: दंडात्मक (FIR और मुकदमा) और निवारक (सुरक्षा कार्यवाही)। यह राज्य को पुलिस रिपोर्ट, मीडिया या सोशल मीडिया से मिली सामग्री के आधार पर गड़बड़ी की मात्र संभावना पर कार्रवाई करने का अधिकार देता है। कार्यपालक मजिस्ट्रेटों (या कमिश्नरेट में SEM के रूप में कार्य करने वाली पुलिस) की भागीदारी प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक कार्यों का मिश्रण करती है। आदतन अपराधियों के लिए 3 साल तक के कारावास का प्रावधान (धारा 129) एक मजबूत निवारक दृष्टिकोण को दर्शाता है। NCRB 2022 के आंकड़े (सार्वजनिक शांति के खिलाफ 57,082 मामले) ऐसे उपकरणों की परिचालन प्रासंगिकता को रेखांकित करते हैं।

सुरक्षा उपाय और न्यायिक जांच

दुरुपयोग को रोकने के लिए, BNSS एक लिखित प्रारंभिक आदेश (धारा 130), साक्ष्य प्रस्तुति के साथ एक जांच (धारा 135-136), और अपील के रास्ते (धारा 414) और आपराधिक पुनरीक्षण (धारा 438-442) को अनिवार्य करता है। संवैधानिक आधार अनुच्छेद 19(2) और 19(3) में निहित है, जो सार्वजनिक व्यवस्था के लिए स्वतंत्रताओं पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देते हैं। मधु लिमये मामले में सर्वोच्च न्यायालय का सत्यापन व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए स्थायी मिसाल प्रदान करता है।

भविष्य की संभावनाएं / आगे का रास्ता

सांप्रदायिक तनाव, चुनावी हिंसा और फर्जी खबरों से भीड़ जुटाने के प्रबंधन में इन प्रावधानों का प्रभावी और लक्षित उपयोग महत्वपूर्ण होगा। मनमानी से बचने के लिए कार्यपालक मजिस्ट्रेटों और पुलिस के लिए इन शक्तियों के सूक्ष्म अनुप्रयोग पर निरंतर प्रशिक्षण आवश्यक है। उच्च न्यायालयों के माध्यम से न्यायिक निरीक्षण संभावित अतिरेक पर अंतिम नियंत्रण बना रहेगा।

पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी

कार्यपालक मजिस्ट्रेट (EM)
एक सिविल अधिकारी (अक्सर एक ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट, या अन्य नियुक्त अधिकारी) जिसे CrPC/BNSS के तहत कार्यकारी और मजिस्ट्रेट शक्तियां प्राप्त होती हैं, जो न्यायिक मजिस्ट्रेटों से अलग होता है।
बंधपत्र
किसी व्यक्ति द्वारा कुछ शर्तों (जैसे, शांति बनाए रखना) का पालन करने का एक लिखित वचन। 'ज़मानत के बिना बंधपत्र' एक व्यक्तिगत वादा है, जबकि 'ज़मानती बंधपत्र' में एक तीसरे पक्ष की ज़मानत शामिल होती है जो व्यक्ति के अनुपालन की गारंटी देता है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR)
संज्ञेय अपराध के बारे में जानकारी प्राप्त होने पर पुलिस द्वारा तैयार किया गया एक लिखित दस्तावेज़, जो आपराधिक न्याय प्रक्रिया को गति प्रदान करता है।
उचित प्रतिबंध (अनुच्छेद 19)
संविधान अनुच्छेद 19(1) के तहत भाषण और सभा जैसी स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है, लेकिन खंड (2) से (6) राज्य को संप्रभुता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता जैसे आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देते हैं।

याद रखने वाले तथ्य

कार्ड दबाएँ और जवाब देखें। पहले खुद याद करने की कोशिश करें।

परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • डेटा: BNSS की धारा 129 के तहत अधिकतम कारावास 3 साल है।
  • नोडल निकाय: कार्यपालक मजिस्ट्रेट (EM) और विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) सुरक्षा कार्यवाही करते हैं।
  • कानूनी बिंदु: सुरक्षा कार्यवाही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अध्याय IX द्वारा शासित होती है।
  • केस कानून: मधु लिमये बनाम सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट, मुंगेर (1970) ने निवारक प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।

गलती मत करना!

वे सुरक्षा कार्यवाही (निवारक, अपराध से पहले) को FIR पंजीकरण (दंडात्मक, संज्ञेय अपराध के बाद) के साथ भ्रमित करेंगे। वे विभिन्न धाराओं के तहत अधिकतम कारावास की अवधि (जैसे, धारा 126-128 के लिए 1 साल बनाम धारा 129 के लिए 3 साल) को भी बदल सकते हैं। एक और भ्रम यह है कि कार्यवाही कौन करता है (कार्यपालक मजिस्ट्रेट बनाम न्यायिक मजिस्ट्रेट) इसे मिलाना।

मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें

  • निवारक न्यायशास्त्र
  • अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताओं और अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन
  • प्रशासनिक विवेक बनाम न्यायिक सुरक्षा
  • सार्वजनिक शांति का सक्रिय रखरखाव

अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत, शांति भंग को रोकने के लिए सुरक्षा कार्यवाही मुख्य रूप से किस प्राधिकारी के समक्ष की जाती है?

  2. Q2मध्यम

    भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत सुरक्षा कार्यवाही के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.वे एक संज्ञेय अपराध किए जाने के बाद शुरू की जाती हैं, जो FIR के समान है।
    2. 2.ऐसी कार्यवाही की जांच आमतौर पर छह महीने की अवधि के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
    3. 3.इन प्रावधानों को सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत उचित प्रतिबंधों के रूप में बरकरार रखा है।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3मध्यम

    धारा 129 के तहत शुरू की गई कार्यवाही में बंधपत्र प्रस्तुत करने में विफलता के लिए BNSS के तहत अधिकतम कारावास की अवधि क्या निर्धारित की गई है?

  4. Q4मध्यम

    लेख में चर्चा के अनुसार, BNSS के तहत निवारक सुरक्षा कार्यवाही का प्राथमिक संवैधानिक औचित्य क्या है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. BNSS का पूर्ण रूप क्या है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता

2. किसकी जगह ली क्या है?

दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)

3. नियंत्रक अध्याय क्या है?

BNSS का अध्याय IX

4. अधिकतम कारावास (धारा 129) क्या है?

3 साल

5. जांच की समय सीमा क्या है?

6 महीने

6. मुख्य संवैधानिक अनुच्छेद क्या है?

अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b), 19(2), 19(3)

7. ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय का मामला क्या है?

मधु लिमये बनाम सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट, मुंगेर (1970)

8. संबंधित आयोग की रिपोर्टें क्या है?

द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007), भारत का विधि आयोग (1969)

सभी स्रोत

इसी विषय, राज्य या परीक्षा की पिछले 30 दिनों की खबरें

राजव्यवस्था
4 प्रश्न · 4 मिनट

ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम 2019: सरकारी दस्तावेज़ों में जैविक पुरुषों को 'महिला' के रूप में दर्ज करने की धारा 7 और नियम 7 को चुनौती देने वाली याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का केंद्र को नोटिस

सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रावधानों को चुनौती देने और 2014 के NALSA निर्णय पर पुनर्विचार की मांग करने वाली एक याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया है। मुख्य कानूनी बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या सर्जरी के बाद महिला के रूप में पहचान रखने वाले जैविक पुरुष, जैविक महिलाओं के लिए विशेष रूप से बनाए गए संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण का लाभ उठा सकते हैं, जिससे कानून में लैंगिक पहचान बनाम जैविक लिंग के बारे में मौलिक प्रश्न उठते हैं।

चुनौतीपूर्ण अधिनियम: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019

UPSC9BPSC7UPPSC7+2
Dainik Bhaskar
राजव्यवस्था
4 प्रश्न · 3 मिनट

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: दिल्ली विश्वविद्यालय में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (FYUP) के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (FYUP) को दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू करने में गंभीर चुनौतियाँ आ रही हैं। छात्रों को एक वर्षीय स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है, जो अस्पष्ट दिशानिर्देशों, कमज़ोर बुनियादी ढांचे और उच्च शिक्षा के मूल उद्देश्य को प्रभावित करने वाले वैचारिक भार के प्रणालीगत मुद्दों को सामने लाता है।

FYUP का पूर्ण रूप: चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम

CTET9UPSC8DSSSB8+7
Indian Express
राजव्यवस्था
3 प्रश्न · 3 मिनट

पॉक्सो अधिनियम 2012: जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने शादी के बावजूद आरोप रद्द करने से इनकार किया, सहमति से बने किशोर संबंधों में 'ग्रे एरिया' का मुद्दा उठाया

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 में एक महत्वपूर्ण 'ग्रे एरिया' का मुद्दा उठाया है, जहाँ इसके कड़े प्रावधान सहमति से बने किशोर संबंधों को अपराधी बना सकते हैं। न्यायालय ने एक व्यक्ति के खिलाफ आरोप रद्द करने से इनकार कर दिया, भले ही नाबालिग लड़की ने उसकी पत्नी होने का दावा किया हो। न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब पीड़िता 18 वर्ष से कम हो तो उसकी सहमति अप्रासंगिक है।

पॉक्सो अधिनियम के अधिनियमन का वर्ष: 2012

UPSC8CTET8BPSC7+6
Indian Express
राजव्यवस्था
4 प्रश्न · 2 मिनट

UAPA के तहत विदेशियों को ज़मानत: सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया, कानूनी प्रवेश पर रोक नहीं

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत विदेशी नागरिकों को ज़मानत देने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी विदेशी का भारत में प्रवेश कानूनी और अधिकृत था, तो UAPA की धारा 43D(7) के तहत कड़ी ज़मानत शर्तें अपने आप लागू नहीं होती हैं। अवैध प्रवेश साबित करने का बोझ अभियोजन पक्ष पर होगा।

UAPA का पूर्ण रूप: गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम

UPSC8BPSC7UPPSC7+2
Hindustan
राजव्यवस्था
3 प्रश्न · 3 मिनट

UAPA के तहत विदेशी नागरिकों की ज़मानत: सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 43D(7) की शर्तें स्पष्ट कीं, ज़मानत से इनकार के लिए वैध प्रवेश का प्रमाण अनिवार्य किया

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल विदेशी नागरिक होना गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत ज़मानत से इनकार करने का आधार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि धारा 43D(7) के तहत ज़मानत से इनकार के लिए, अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने भारत में अवैध रूप से प्रवेश किया था, साथ ही उस पर UAPA के तहत आरोप भी हों और वह गैर-नागरिक हो।

UAPA का पूर्ण रूप: गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम

UPSC8BPSC7UPPSC7+1
Dainik BhaskarHindustan2 स्रोत
राजव्यवस्था
3 प्रश्न · 2 मिनट

ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम 2026 और NALSA के फैसले को 'जैविक महिलाओं' के अधिकारों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती

सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) ने 2014 के NALSA के फैसले के बाद और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2026 के तहत स्थापित लैंगिक पहचान की कानूनी रूपरेखा को चुनौती दी है। याचिका में तर्क दिया गया है कि स्व-पहचान वाले लिंग के आधार पर दस्तावेज़ों में बदलाव की अनुमति देना 'जैविक महिलाओं' के लिए बने अधिकारों और सुरक्षा का उल्लंघन करता है, जिससे आरक्षित सीटों और केवल महिलाओं के लिए बने स्थानों जैसे क्षेत्रों पर असर पड़ता है।

NALSA का पूर्ण रूप: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण

UPSC8BPSC7UPPSC7
The Hindu