राजव्यवस्था

ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम 2019: सरकारी दस्तावेज़ों में जैविक पुरुषों को 'महिला' के रूप में दर्ज करने की धारा 7 और नियम 7 को चुनौती देने वाली याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का केंद्र को नोटिस

29 अक्टूबर 20264 मिनट1 स्रोत4 प्रश्नखबर 1 / 67

प्रिलिम्स के लिए: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, NALSA बनाम भारत संघ (2014), संविधान का अनुच्छेद 15(3), चुनौतीपूर्ण अधिनियम, चुनौतीपूर्ण धाराएँ, याचिकाकर्ता, समीक्षाधीन प्रमुख सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, सुनवाई की तारीख

मेन्स के लिए: अधिकारों का अंतर्संबंध; प्रतिपूरक भेदभाव बनाम स्व-पहचान; जैविक अनिवार्यता बनाम लैंगिक स्वायत्तता

स्रोत:Dainik Bhaskar

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रावधानों को चुनौती देने और 2014 के NALSA निर्णय पर पुनर्विचार की मांग करने वाली एक याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया है। मुख्य कानूनी बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या सर्जरी के बाद महिला के रूप में पहचान रखने वाले जैविक पुरुष, जैविक महिलाओं के लिए विशेष रूप से बनाए गए संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण का लाभ उठा सकते हैं, जिससे कानून में लैंगिक पहचान बनाम जैविक लिंग के बारे में मौलिक प्रश्न उठते हैं।

सारांश

  • विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया द्वारा दायर याचिका ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम, 2019 की धारा 7 और नियम 7 को चुनौती देती है, जो जैविक पुरुषों को सर्जरी के बाद आधिकारिक दस्तावेज़ों में 'महिला' के रूप में पंजीकृत करने की अनुमति देता है।
  • याचिका 2014 के ऐतिहासिक NALSA निर्णय की समीक्षा की मांग करती है, जिसने लैंगिक पहचान को कानूनी मान्यता दी थी, यह तर्क देते हुए कि यह जैविक महिलाओं के लिए बने संवैधानिक सुरक्षा उपायों (अनुच्छेद 14, 15(3), 16, 19(1)(a), 21) को प्रभावित करता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने 28 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान, ट्रांसजेंडर महिलाओं को जैविक महिलाओं का दर्जा देने पर सवाल उठाया और खेल, नौकरियों और लिंग-पृथक स्थानों में निजता के मुद्दों को उठाया।

मुख्य बातें

  • कानूनी चुनौती

    सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम, 2019 के तहत जैविक पुरुषों को आधिकारिक दस्तावेज़ों में 'महिला' के रूप में पंजीकृत करने के कानूनी आधार को चुनौती देने वाली एक याचिका पर नोटिस जारी किया है।

  • मुख्य संवैधानिक संघर्ष

    यह मामला लैंगिक स्व-पहचान के अधिकार (NALSA निर्णय) को जैविक महिलाओं के लिए विशेष रूप से बनाए गए संवैधानिक सुरक्षा उपायों (अनुच्छेद 14, 15(3), 16, 21) के विरुद्ध खड़ा करता है।

  • न्यायिक जाँच और विधायी भूमिका

    सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि विधायिका ने इस मुद्दे पर फैसला नहीं किया है, जबकि सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि इस मामले को संसद पर छोड़ देना चाहिए।

संदर्भ / पृष्ठभूमि

भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए कानूनी ढाँचा सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के NALSA निर्णय द्वारा स्थापित किया गया था, जिसने स्व-पहचानित लिंग के अधिकार को मान्यता दी थी। इसके बाद ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 आया। हालाँकि, इस अधिनियम की धारा 7 और नियम 7, जो आधिकारिक दस्तावेज़ों में लिंग परिवर्तन की अनुमति देते हैं, विवादास्पद हो गए हैं। वर्तमान याचिका एक महत्वपूर्ण प्रति-आंदोलन का प्रतिनिधित्व करती है, यह तर्क देते हुए कि ये प्रावधान जैविक महिलाओं के लिए अद्वितीय संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर करते हैं, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से व्यवस्थित भेदभाव और शारीरिक भेद्यता का सामना किया है।

मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ

याचिका एक गहन कानूनी दुविधा उठाती है: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को महिलाओं के लिए आरक्षण के अंतर्निहित 'प्रतिपूरक भेदभाव' सिद्धांतों के साथ संतुलित करना। यह तर्क देती है कि जैविक लिंग (क्रोमोसोम, आनुवंशिकी, प्रजनन क्षमता) अपरिवर्तनीय है, और महिला-विशिष्ट लाभों तक पहुँचने के लिए लैंगिक पहचान को जैविक लिंग के साथ भ्रमित करना अनुच्छेद 14 (समानों के बीच समानता) का उल्लंघन करता है। इसके निहितार्थ बहुत बड़े हैं, जो राजनीति और नौकरियों में महिलाओं के आरक्षण, खेलों में भागीदारी और छात्रावासों, जेलों और अस्पतालों में निजता को प्रभावित करते हैं। सॉलिसिटर जनरल का जैविक पुरुषों के महिला खेलों में प्रतिस्पर्धा करने का उदाहरण वर्तमान कानूनी व्याख्या के व्यावहारिक परिणामों को उजागर करता है।

भविष्य की संभावना / आगे का रास्ता

सर्वोच्च न्यायालय का नोटिस अधिकारों के इस जटिल अंतर्संबंध की फिर से जाँच करने की इच्छा को इंगित करता है। परिणाम NALSA निर्णय की पुनर्व्याख्या का कारण बन सकता है या संसद को लैंगिक पहचान और लिंग-आधारित अधिकारों के बीच की सीमाओं पर अधिक सटीक रूप से कानून बनाने के लिए मजबूर कर सकता है। एक संभावित 'आगे का रास्ता' कुछ महिला-विशिष्ट लाभों के लिए अलग श्रेणियाँ या मानदंड बनाना हो सकता है, जिससे ट्रांसजेंडर अधिकारों और जैविक महिलाओं के लिए सुरक्षात्मक प्रावधानों के मूल इरादे दोनों का सम्मान सुनिश्चित हो, एक ऐसा कार्य जिसे न्यायालय ने विधायिका का बताया।

पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा, उनके कल्याण और भेदभाव के निषेध का प्रावधान करने वाला एक अधिनियम। यह किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर के रूप में पहचान प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करने और सर्जरी के बाद, लिंग में परिवर्तन दर्शाने वाले संशोधित प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करने की अनुमति देता है।
NALSA बनाम भारत संघ (2014)
सर्वोच्च न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय जिसने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को 'तीसरे लिंग' के रूप में मान्यता दी, अनुच्छेद 14, 15, 16, 19(1)(a) और 21 के तहत उनके मौलिक अधिकारों की पुष्टि की, और केंद्र और राज्यों को उनकी लैंगिक पहचान को कानूनी मान्यता देने का निर्देश दिया।
संविधान का अनुच्छेद 15(3)
राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार देता है। यह शिक्षा, रोजगार और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण और उनके कल्याण के लिए योजनाओं का संवैधानिक आधार है।

याद रखने वाले तथ्य

कार्ड दबाएँ और जवाब देखें। पहले खुद याद करने की कोशिश करें।

परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • डेटा: 4.87 लाख - वर्ष 2011 की जनगणना में ट्रांसजेंडर/'अन्य' लिंग जनसंख्या।
  • नोडल निकाय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (याचिका की सुनवाई कर रहा है)।
  • कानूनी बिंदु: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7 और नियम 7।

गलती मत करना!

वे पूछ सकते हैं कि याचिका में किन अनुच्छेदों का उल्लेख किया गया है, सही अनुच्छेदों (14, 15(3), 16, 19, 21) को संभावित लेकिन गलत अनुच्छेदों जैसे अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता) या अनुच्छेद 32 (उपचार) के साथ मिलाकर। एक और जाल 2014 के NALSA निर्णय को 2019 के अधिनियम के साथ भ्रमित करना है।

मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें

  • अधिकारों का अंतर्संबंध
  • प्रतिपूरक भेदभाव बनाम स्व-पहचान
  • जैविक अनिवार्यता बनाम लैंगिक स्वायत्तता

अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    कौन सा ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, जो वर्तमान में एक हालिया याचिका में समीक्षाधीन है, ने भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की लैंगिक पहचान को पहली बार कानूनी मान्यता दी थी?

  2. Q2कठिन

    सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में सुनी गई याचिका के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.यह ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के विशिष्ट प्रावधानों को चुनौती देती है।
    2. 2.याचिकाकर्ता का तर्क है कि जैविक लिंग को चिकित्सा या सर्जिकल प्रक्रियाओं के माध्यम से बदला जा सकता है।
    3. 3.याचिका स्थानीय निकायों और खेलों में महिलाओं के आरक्षण पर संभावित प्रभावों का हवाला देती है।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3मध्यम

    भारत की वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, 'अन्य' लिंग श्रेणी के तहत दर्ज अनुमानित जनसंख्या कितनी थी, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति शामिल हैं?

  4. Q4मध्यम

    वर्तमान कानूनी संदर्भ में अनुच्छेद 15(3) के आवेदन के संबंध में याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई प्राथमिक संवैधानिक चिंता क्या है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. चुनौतीपूर्ण अधिनियम क्या है?

ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019

2. चुनौतीपूर्ण धाराएँ क्या है?

धारा 7 और नियम 7

3. याचिकाकर्ता क्या है?

विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया

4. समीक्षाधीन प्रमुख सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय क्या है?

NALSA बनाम भारत संघ (2014)

5. सुनवाई की तारीख क्या है?

28 अक्टूबर 2026

6. ट्रांसजेंडर जनसंख्या (वर्ष 2011 की जनगणना) क्या है?

4.87 लाख ('अन्य' लिंग श्रेणी में)

7. उद्धृत प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद क्या है?

अनुच्छेद 14, 15(3), 16, 19(1)(a), 21

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