सर्वोच्च न्यायालय कोलेजियम प्रणाली: पारदर्शी रोस्टर की मांग और न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया का बचाव
किस परीक्षा के लिए कितनी ज़रूरी
- UPSC7/10
1खबर एक नज़र में
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ए.एस. ओका ने मामलों के आवंटन में भारत के मुख्य न्यायाधीश के विवेक को समाप्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक उचित रोस्टर प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया है और न्यायिक नियुक्तियों के लिए मौजूदा कोलेजियम प्रणाली का बचाव किया है। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना सभी स्तरों पर न्यायिक जवाबदेही को मजबूत किया जाना चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रस्तावों का मात्र प्रकाशन कोलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं करता है।
उचित केस रोस्टर
एक पारदर्शी रोस्टर प्रणाली के माध्यम से मामलों के आवंटन में भारत के मुख्य न्यायाधीश के विवेकाधिकार को समाप्त करने की मांग।
कोलेजियम का बचाव
न्यायिक नियुक्तियों के लिए मौजूदा कोलेजियम प्रणाली को तब तक बनाए रखा जाना चाहिए जब तक कि कोई स्पष्ट रूप से बेहतर विकल्प न मिल जाए।
प्रक्रियात्मक पारदर्शिता
कोलेजियम में वास्तविक पारदर्शिता के लिए स्पष्ट प्रक्रियाओं की आवश्यकता है, न कि केवल सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रस्तावों को प्रकाशित करने की।
2याद रखने वाले तथ्य
कार्ड दबाएँ और जवाब देखें। पहले खुद याद करने की कोशिश करें।
3विस्तृत विश्लेषण
संदर्भ / पृष्ठभूमि
भारत में न्यायिक सुधारों पर बहस दो प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित है: न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता और न्यायालयों का आंतरिक प्रशासन, विशेष रूप से मुख्य न्यायाधीश की 'मास्टर ऑफ द रोस्टर' शक्ति। न्यायमूर्ति ओका का हस्तक्षेप इन प्रक्रियाओं में सुधार के लिए चल रही मांगों के बीच आया है ताकि कार्यकारी हस्तक्षेप से न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए जवाबदेही बढ़ाई जा सके।
मुख्य विश्लेषण और निहितार्थ
न्यायमूर्ति ओका का रुख एक सूक्ष्म दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। वह न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कोलेजियम प्रणाली को सबसे अच्छे उपलब्ध तंत्र के रूप में देखते हैं, जो लोकतंत्र का एक आधारभूत सिद्धांत है। उनका तर्क है कि कार्यान्वयन में खामियां स्वयं प्रणाली को अमान्य नहीं करती हैं। साथ ही, वह इसके कामकाज में पारदर्शिता की कमी और मामलों के आवंटन में विवेकाधीन शक्ति की आलोचना करते हैं, जो आंतरिक जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। यह न्यायपालिका के भीतर स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच जटिल संतुलन को दर्शाता है।
भविष्य की संभावनाएं / आगे का रास्ता
आगे के रास्ते में ठोस कदम शामिल हैं: कथित पूर्वाग्रह को रोकने के लिए मामलों के आवंटन हेतु एक वस्तुनिष्ठ, नियम-आधारित रोस्टर प्रणाली तैयार करना। कोलेजियम के लिए, निर्णयों के मात्र प्रकटीकरण से हटकर परामर्श प्रक्रिया को मानकीकृत करने, चयन और अस्वीकृति के कारणों को दर्ज करने और प्रक्रिया को संस्थागत बनाने के लिए एक सचिवालय स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, जैसा कि पिछले निर्णयों और समितियों द्वारा सुझाया गया है।
4पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए ज़रूरी किताबी जानकारी
- कोलेजियम प्रणाली
- भारत में उच्च न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों) में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की एक प्रणाली, जो न्यायिक घोषणाओं (तीन न्यायाधीशों के मामलों) के माध्यम से विकसित हुई है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीशों के बीच बंद कमरे में परामर्श शामिल होता है।
- मास्टर ऑफ द रोस्टर
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) का पीठों का गठन करने और न्यायाधीशों को मामलों का आवंटन करने का विशेषाधिकार। यह प्रशासनिक शक्ति संभावित दुरुपयोग के संबंध में बहस का विषय रही है।
- न्यायिक स्वतंत्रता
- भारतीय संविधान की एक मूल विशेषता जो यह सुनिश्चित करती है कि न्यायपालिका कार्यकारी और विधायी शाखाओं के हस्तक्षेप से मुक्त है, जिससे उसे निष्पक्ष निर्णय देने की अनुमति मिलती है।
5परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- कानूनी बिंदु: कोलेजियम प्रणाली और 'तीन न्यायाधीशों के मामलों' में इसका आधार।
- नोडल निकाय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय और उसकी आंतरिक प्रशासनिक शक्तियाँ।
- अवधारणा: 'न्यायिक स्वतंत्रता' बनाम 'न्यायिक जवाबदेही' का सिद्धांत।
गलती मत करना!
'कोलेजियम प्रणाली' (नियुक्तियों के लिए) को 'मास्टर ऑफ द रोस्टर' शक्ति (मामलों के आवंटन के लिए) के साथ भ्रमित करना। ये न्यायिक सुधार के दो अलग-अलग मुद्दे हैं। साथ ही, CJAR (न्यायिक जवाबदेही और सुधार अभियान) को एक सरकारी निकाय के साथ भ्रमित करना।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में लिखें
प्रक्रियात्मक पारदर्शिता, संस्थागत अखंडता, स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन
6अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1आसान
भारत में 'कोलेजियम प्रणाली' मुख्य रूप से निम्नलिखित में से किस कार्य से संबंधित है?
व्याख्या: तीन न्यायाधीशों के मामलों के माध्यम से स्थापित कोलेजियम प्रणाली, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए तंत्र है। मामलों का आवंटन मुख्य न्यायाधीश की 'मास्टर ऑफ द रोस्टर' शक्ति द्वारा नियंत्रित होता है।
- Q2कठिन
पूर्व न्यायाधीश ए.एस. ओका द्वारा व्यक्त किए गए विचारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.उन्होंने कोलेजियम प्रणाली को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) से बदलने का आह्वान किया।
- 2.उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर कोलेजियम के प्रस्तावों को प्रकाशित करने से पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
- 3.उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में मामलों के आवंटन को विनियमित करने के लिए एक उचित रोस्टर प्रणाली की आवश्यकता पर बल दिया।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि न्यायमूर्ति ओका ने कोलेजियम प्रणाली का बचाव किया, यह तर्क देते हुए कि जब तक कोई बेहतर विकल्प नहीं मिल जाता, तब तक इसे बदला नहीं जाना चाहिए। कथन 2 गलत है क्योंकि उन्होंने तर्क दिया कि वेबसाइट पर मात्र प्रकाशन से पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं होती है। कथन 3 सही है क्योंकि उन्होंने स्पष्ट रूप से मामलों के आवंटन के लिए एक उचित रोस्टर प्रणाली की आवश्यकता पर बल दिया था।
- Q3मध्यम
न्यायमूर्ति ए.एस. ओका ने अपने विचार निम्नलिखित में से किस संस्था द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में व्यक्त किए?
व्याख्या: लेख में कहा गया है कि न्यायमूर्ति ओका ने 'न्यायिक जवाबदेही और सुधार अभियान (CJAR)' द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित किया। इस कार्यक्रम का विषय 'सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की जवाबदेही' था।
- Q4मध्यम
समाचार में सुझाए गए सर्वोच्च न्यायालय में 'उचित रोस्टर प्रणाली' का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
व्याख्या: एक उचित रोस्टर प्रणाली की मांग विशेष रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश की 'मास्टर ऑफ द रोस्टर' के रूप में प्रशासनिक शक्ति को लक्षित करती है। इसका उद्देश्य इस विवेकाधीन शक्ति को न्यायालय की विभिन्न पीठों को मामलों के आवंटन के लिए एक पारदर्शी, नियम-आधारित प्रणाली से बदलना है।
7सभी स्रोत
मूल खबर27 अक्टूबर 2026 · खबर पढ़ें
इससे जुड़ी खबरें
इसी विषय, राज्य या परीक्षा की पिछले 30 दिनों की खबरें
सर्वोच्च न्यायालय कोलेजियम ने 26 अक्तूबर, 2026 को चार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश की
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय कोलेजियम ने चार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है।
कोलेजियम की बैठक की तिथि: 26 अक्तूबर, 2026

भारत बाल पोर्नोग्राफी और बिना सहमति वाली अश्लील सामग्री से निपटने के लिए नीतिगत ढांचे पर विचार कर रहा है, सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई 4 सप्ताह के लिए स्थगित
केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया है कि वह बाल पोर्नोग्राफी और वयस्कों से संबंधित बिना सहमति वाली अश्लील सामग्री के प्रसार से निपटने के लिए एक विधायी नीतिगत ढांचे पर विचार कर रही है। यह ढांचा ऑनलाइन मध्यस्थों पर सक्रिय रिपोर्टिंग और सामग्री हटाने की बाध्यता लगा सकता है और तीसरे पक्ष से शिकायतें स्वीकार कर सकता है।
वर्तमान संदर्भ: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 27 अक्टूबर, 2026 को CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की सर्वोच्च न्यायालय पीठ को सूचित किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस्तीफा देने वाले विधायकों के लिए 'चुनाव व्यय जमा' तंत्र और 5 साल के प्रतिबंध पर निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा
सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका (PIL) पर जवाब मांगा है, जिसमें एक नए 'चुनाव व्यय जमा' तंत्र और चुनाव जीतने के तुरंत बाद बिना वैध कारण बताए इस्तीफा देने वाले विधायकों पर 5 साल के चुनाव प्रतिबंध का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य उन अनावश्यक इस्तीफों को रोकना है जिनसे महंगे उपचुनाव होते हैं, जिनका खर्च सार्वजनिक कोष से वहन किया जाता है।
प्रस्तावित प्रतिबंध की अवधि: 5 साल

बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) और बिना सहमति वाली आपत्तिजनक सामग्री पर अंकुश लगाने के लिए भारत का प्रस्तावित नीतिगत ढाँचा
केंद्र सरकार ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) और बिना सहमति वाली आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार से निपटने के लिए एक व्यापक नीतिगत ढांचे पर विचार कर रही है। इस ढांचे में मध्यस्थों पर उचित सावधानी बरतने की बाध्यताएँ लगाने का प्रस्ताव है, जिसमें आपत्तिजनक सामग्री को अनिवार्य रूप से हटाना और अधिकारियों को रिपोर्ट करना शामिल है। सरकार इस उद्देश्य के लिए एक वैधानिक विधायी तंत्र पर भी विचार कर रही है।
सरकारी प्रतिनिधि: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023: सर्वोच्च न्यायालय ने DNPA द्वारा अधिनियम की धारा 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37, 44(3) को चुनौती देने पर केंद्र से जवाब मांगा
सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) द्वारा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP अधिनियम) की कुछ धाराओं को दी गई कानूनी चुनौती पर केंद्र से जवाब मांगा है। याचिका में तर्क दिया गया है कि कुछ प्रावधान प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं और 'न्यूजरूम बंद कर सकते हैं'। इसमें नौ धाराओं और तीन संबंधित नियमों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।
DPDP एक्ट का पूरा नाम: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम

सर्वोच्च न्यायालय ने एसिड हमले की नीति की विफलता पर चिंता जताई: राज्य की जवाबदेही और बिक्री दिशानिर्देशों के सख्त प्रवर्तन की मांग की
सर्वोच्च न्यायालय ने मौजूदा दिशानिर्देशों के बावजूद एसिड हमलों को रोकने में लगातार विफलता की गंभीर जांच की है, जिसमें राज्य स्तर पर कमजोर प्रवर्तन और अधिकारियों की जवाबदेही की कमी पर प्रकाश डाला गया है। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को नीतिगत खामियों को दूर करने के लिए मिलकर काम करने का निर्देश दिया है, साथ ही ऐसे अपराधों के लिए सजा बढ़ाने का भी सुझाव दिया है।
मुख्य निर्देश निकाय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
2 स्रोत