राजव्यवस्था

झारखंड उच्च न्यायालय ने शारीरिक परीक्षण में 3 सेकंड की देरी के कारण अस्वीकृत दिव्यांग उम्मीदवार की नियुक्ति का आदेश दिया

4 नवंबर 20262 मिनट1 स्रोत4 प्रश्नखबर 44 / 122

प्रिलिम्स के लिए: दिव्यांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम, 2016, उचित समायोजन, उच्च न्यायालयों का रिट क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 226), न्यायालय, मामले का प्रकार, उम्मीदवार का नाम, ज़िला, कुल पद

मेन्स के लिए: उचित समायोजन, समावेशी भर्ती, दिव्यांगता अधिकार, अनुच्छेद 226, सामाजिक न्याय

स्रोत:HindustanHindustan

चर्चा में क्यों?

झारखंड उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि शारीरिक दक्षता परीक्षा में तीन सेकंड की देरी दिव्यांग उम्मीदवार को नियुक्ति से वंचित करने का आधार नहीं हो सकती। न्यायालय ने राज्य सरकार को ज्योतिका पाल नामक उम्मीदवार को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया, जिसे उसकी दिव्यांगता के लिए कोई अतिरिक्त समय या विशेष सुविधा दिए बिना निर्धारित समय से 3 सेकंड अधिक में दौड़ पूरी करने के कारण अस्वीकृत कर दिया गया था।

सारांश

  • झारखंड उच्च न्यायालय ने माना कि शारीरिक परीक्षण में 3 सेकंड की मामूली देरी का उपयोग दिव्यांग उम्मीदवार को रोज़गार से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता है।
  • न्यायालय ने राज्य सरकार को दिव्यांग उम्मीदवार ज्योतिका पाल को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया।
  • यह मामला दुमका ज़िले में 328 चौकीदारों की भर्ती से संबंधित है, जहाँ शारीरिक परीक्षण के दौरान उम्मीदवार को उसकी दिव्यांगता के लिए कोई अतिरिक्त समय या विशेष सुविधा नहीं दी गई थी।

मुख्य बातें

  • दिव्यांगता अधिकारों पर न्यायालय का फैसला

    झारखंड उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि शारीरिक परीक्षण में तीन सेकंड की देरी दिव्यांग उम्मीदवार को अयोग्य नहीं ठहरा सकती, जिससे उचित समायोजन के अधिकार को बल मिला।

  • उचित समायोजन से इनकार

    शारीरिक परीक्षण के दौरान उम्मीदवार को उसकी दिव्यांगता के लिए अतिरिक्त समय या विशेष सुविधाएँ नहीं दी गईं, जिसे न्यायालय ने उसके अधिकारों का उल्लंघन पाया।

  • सरकार को कार्रवाई का निर्देश

    न्यायालय ने राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर उम्मीदवार को नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया, जिससे भर्ती प्रक्रियाओं के लिए एक मिसाल कायम हुई।

पृष्ठभूमि

यह मामला झारखंड के दुमका ज़िले में 328 चौकीदारों की भर्ती से संबंधित है। ज्योतिका पाल, एक दिव्यांग उम्मीदवार, ने लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन उसे सामान्य उम्मीदवारों के साथ शारीरिक दक्षता परीक्षा में शामिल किया गया, जिसमें उसकी दिव्यांगता के लिए कोई समायोजन नहीं किया गया। उसने दौड़ 10 मिनट और 3 सेकंड में पूरी की, जो निर्धारित समय से केवल 3 सेकंड अधिक था, जिसके कारण उसे अयोग्य घोषित कर दिया गया।

प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव

झारखंड उच्च न्यायालय का यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिव्यांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत दिव्यांग व्यक्तियों (PwDs) के लिए उचित समायोजन के सिद्धांत को बरकरार रखता है। न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मामूली देरी रोज़गार में बाधा नहीं बननी चाहिए। इस फैसले में राज्य की आलोचना भी की गई है कि उसने अतिरिक्त समय या संशोधित परीक्षण शर्तें प्रदान नहीं कीं, जो अधिनियम का उल्लंघन है। यह भर्ती निकायों के लिए समावेशी शारीरिक परीक्षण डिज़ाइन करने के लिए एक मिसाल कायम करता है।

आगे की राह

राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर न्यायालय के आदेश का पालन करना होगा। इस फैसले से राज्य की भर्ती प्रक्रियाओं में शारीरिक परीक्षण प्रक्रियाओं की समीक्षा होने की उम्मीद है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए समावेशी हों। यह रोज़गार में दिव्यांगता अधिकारों के लिए कानूनी ढांचे को भी मज़बूत करता है।

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पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं

दिव्यांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम, 2016
एक भारतीय कानून जो दिव्यांग व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव को प्रतिबंधित करता है और शिक्षा, रोज़गार तथा सार्वजनिक सेवाओं में उचित समायोजन अनिवार्य करता है।
उचित समायोजन
आवश्यक और उचित संशोधन तथा समायोजन ताकि दिव्यांग व्यक्ति दूसरों के साथ समान आधार पर सभी मानवाधिकारों का आनंद ले सकें।
उच्च न्यायालयों का रिट क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 226)
मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और किसी अन्य उद्देश्य के लिए निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की उच्च न्यायालयों की शक्ति।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर उत्तर देखने के लिए कार्ड पर क्लिक करें।

परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • डेटा: 3 सेकंड की देरी; नियुक्ति पत्र के लिए 8 सप्ताह की समय-सीमा
  • नोडल निकाय: झारखंड उच्च न्यायालय
  • कानूनी बिंदु: दिव्यांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम, 2016 (उचित समायोजन)

यह गलती न करें!

परीक्षक न्यायालय का नाम बदल सकते हैं (जैसे, 'झारखंड उच्च न्यायालय' के बजाय 'सर्वोच्च न्यायालय' लिख सकते हैं) या देरी को 3 सेकंड से 30 सेकंड या 3 मिनट में बदल सकते हैं। वे ज़िले (दुमका) को किसी अन्य ज़िले या पदों की संख्या (328) को किसी भिन्न आंकड़े से भी भ्रमित कर सकते हैं।

मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु

  • उचित समायोजन, समावेशी भर्ती, दिव्यांगता अधिकार, अनुच्छेद 226, सामाजिक न्याय

कहीं अटके? एक टैप में समझें

अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    शारीरिक परीक्षण में 3 सेकंड की देरी के कारण अस्वीकृत दिव्यांग उम्मीदवार के मामले में किस उच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया?

  2. Q2कठिन

    झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.न्यायालय ने राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया।
    2. 2.उम्मीदवार को उसकी दिव्यांगता के कारण शारीरिक परीक्षण के लिए अतिरिक्त समय दिया गया था।
    3. 3.यह भर्ती दुमका ज़िले में 328 चौकीदार पदों के लिए थी।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3आसान

    दिव्यांग उम्मीदवार ने शारीरिक परीक्षण में निर्धारित समय से कितने सेकंड अधिक लिए?

  4. Q4मध्यम

    इस फैसले में झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा किस प्राथमिक कानूनी सिद्धांत को बरकरार रखा गया है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. झारखंड उच्च न्यायालय ने ज्योतिका पाल के मामले में क्या आदेश दिया?

न्यायालय ने राज्य सरकार को ज्योतिका पाल, एक दिव्यांग उम्मीदवार, जिसे शारीरिक परीक्षण में 3 सेकंड की देरी के कारण अस्वीकृत कर दिया गया था, को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया।

2. ज्योतिका पाल को चौकीदार भर्ती से क्यों अयोग्य घोषित किया गया था?

उसे अयोग्य घोषित कर दिया गया क्योंकि उसने शारीरिक दक्षता परीक्षा निर्धारित समय से 3 सेकंड अधिक में पूरी की, और उसकी दिव्यांगता के लिए कोई अतिरिक्त समय या विशेष सुविधा प्रदान नहीं की गई थी।

3. दुमका में इस भर्ती अभियान में चौकीदार के कितने पद शामिल थे?

यह भर्ती झारखंड के दुमका ज़िले में 328 चौकीदार पदों के लिए थी।

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