राजव्यवस्था

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय: सरकार बिना ठोस आधार के फेसबुक अकाउंट मनमाने ढंग से बंद नहीं करवा सकती

5 नवंबर 20262 मिनट1 स्रोत4 प्रश्नखबर 82 / 111

प्रिलिम्स के लिए: अनुच्छेद 19(1)(a) - वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उच्च न्यायालयों का रिट अधिकार क्षेत्र (अनुच्छेद 226), सोशल मीडिया मध्यस्थ की ज़िम्मेदारी, न्यायालय, पीठ, अगली सुनवाई, शामिल मंच, याचिकाकर्ता

मेन्स के लिए: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया विनियमन, राज्य की सेंसरशिप, अनुच्छेद 19(1)(a), रिट अधिकार क्षेत्र, मध्यस्थ की ज़िम्मेदारी

स्रोत:HindustanHindustan

चर्चा में क्यों?

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा है कि राज्य सरकार किसी व्यक्ति का फेसबुक अकाउंट ठोस तथ्यात्मक आधार के बिना मनमाने ढंग से बंद नहीं करवा सकती। अदालत ने चेतावनी दी है कि अकाउंट बहाल न होने पर मुआवजा लगाया जा सकता है। इससे सोशल मीडिया पर राज्य की मनमानी कार्रवाई के खिलाफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को मज़बूती मिलती है।

सारांश

  • हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को तीन व्यक्तियों के फेसबुक अकाउंट बहाल करने के बारे में निर्णय लेने का निर्देश दिया है। इनमें एक पूर्व मुख्य संसदीय सचिव भी शामिल हैं। आरोप है कि ये अकाउंट सरकार के कहने पर बंद किए गए।
  • अदालत ने कहा कि उचित आधार के बिना सोशल मीडिया अकाउंट मनमाने ढंग से बंद नहीं किए जा सकते। निर्देशों का पालन न होने पर मुआवजे की चेतावनी दी गई है।
  • यह मामला राज्य की ऑनलाइन सामग्री को नियंत्रित करने की शक्ति और सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने के नागरिकों के मौलिक अधिकार के बीच तनाव को सामने लाता है।

मुख्य बातें

  • अकाउंट बंद करने पर HC ने सरकार को फटकारा

    हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकार ठोस साक्ष्य के बिना फेसबुक अकाउंट मनमाने ढंग से बंद नहीं करवा सकती।

  • तीन याचिकाकर्ताओं के अकाउंट बंद

    पूर्व CPS नीरज भारती, बलदेव कुमार और पूर्व डिप्टी एडवोकेट जनरल विनय शर्मा ने आरोप लगाया है कि सरकार की आलोचना करने पर उनके अकाउंट बंद किए गए।

  • 26 नवंबर 2026 को अगली सुनवाई

    अदालत ने याचिकाकर्ताओं से मेटा का सही पता दाखिल करने को कहा है, जिसके बाद नया नोटिस जारी होगा।

पृष्ठभूमि

इस मामले में हिमाचल प्रदेश के तीन व्यक्ति शामिल हैं, जिनके फेसबुक अकाउंट आरोप के अनुसार राज्य सरकार के कहने पर बंद किए गए। उन्होंने उच्च न्यायालय में यह दलील दी कि सरकार अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके आलोचकों को चुप कराने के लिए सोशल मीडिया अकाउंट मनमाने ढंग से बंद करवा रही है। अदालत ने दो अलग-अलग रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की।

प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव

यह फैसला इस सिद्धांत को मज़बूती देता है कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सोशल मीडिया मंचों पर भी लागू होता है। अदालत की यह टिप्पणी कि 'ठोस आधार' के बिना अकाउंट बंद करना मनमाना और कार्रवाई योग्य है, राज्य की सेंसरशिप के खिलाफ मज़बूत संदेश देती है। इससे मेटा जैसे सोशल मीडिया मध्यस्थों की भूमिका भी सामने आती है, जो सरकारी अनुरोधों पर प्रतिक्रिया देते हैं, और यह भी कि कोई भी सामग्री हटाने की कार्रवाई से पहले उचित प्रक्रिया ज़रूरी है।

आगे की राह

अदालत ने राज्य सरकार को अकाउंट बहाल करने पर निर्णय लेने का समय दिया है और चूक होने पर मुआवजे की चेतावनी दी है। 26 नवंबर 2026 की अगली सुनवाई में नया नोटिस जारी होने के बाद अदालत मेटा के जवाब पर विचार करेगी। यह मामला भारत में सामग्री हटाने और अकाउंट निलंबन को लेकर राज्य सरकारों और सोशल मीडिया मंचों के बीच संबंधों की दिशा तय कर सकता है।

हिमाचल प्रदेश से जुड़ाव

हिमाचल प्रदेश की इन परीक्षाओं के लिए ज़रूरी:HPPSC HAS 8/10HPRCA 7/10

पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं

अनुच्छेद 19(1)(a) - वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
भारतीय संविधान का एक मौलिक अधिकार, जो हर नागरिक को अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन रहते हुए अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने की गारंटी देता है।
उच्च न्यायालयों का रिट अधिकार क्षेत्र (अनुच्छेद 226)
अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और किसी अन्य उद्देश्य के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है, जिसमें राज्य की कार्रवाई के विरुद्ध रिट भी शामिल है।
सोशल मीडिया मध्यस्थ की ज़िम्मेदारी
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत सोशल मीडिया मंच मध्यस्थ हैं, जिनकी सामग्री नियंत्रण और सरकारी अनुरोधों से जुड़ी कुछ ज़िम्मेदारियाँ होती हैं।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर उत्तर देखने के लिए कार्ड पर क्लिक करें।

परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • इस तथ्य पर ध्यान दें: 5 नवंबर 2026 को HP उच्च न्यायालय का फैसला
  • इस नोडल निकाय पर ध्यान दें: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय
  • इस कानूनी बिंदु पर ध्यान दें: अनुच्छेद 19(1)(a) - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

यह गलती न करें!

परीक्षक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले संवैधानिक प्रावधान और उस पर उचित प्रतिबंधों के बारे में पूछ सकते हैं। वे अनुच्छेद 19(1)(a) को अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) या अनुच्छेद 14 (समानता) से भ्रमित करने की कोशिश कर सकते हैं। साथ ही, 'उच्च न्यायालय' की जगह 'सर्वोच्च न्यायालय' या 'हिमाचल प्रदेश' की जगह कोई दूसरा राज्य रखा जा सकता है।

मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया विनियमन, राज्य की सेंसरशिप, अनुच्छेद 19(1)(a), रिट अधिकार क्षेत्र, मध्यस्थ की ज़िम्मेदारी

कहीं अटके? एक टैप में समझें

अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    किस उच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि राज्य सरकार ठोस आधार के बिना किसी व्यक्ति का फेसबुक अकाउंट मनमाने ढंग से बंद नहीं करवा सकती?

  2. Q2कठिन

    फेसबुक अकाउंट बंद करने पर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.अदालत ने कहा कि अगर जनहित में हो तो सरकार ठोस आधार के बिना अकाउंट बंद कर सकती है।
    2. 2.अदालत ने चेतावनी दी कि अकाउंट बहाल न होने पर मुआवजा लगाया जा सकता है।
    3. 3.याचिकाकर्ताओं में एक पूर्व मुख्य संसदीय सचिव और एक पूर्व डिप्टी एडवोकेट जनरल शामिल हैं।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3मध्यम

    हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में फेसबुक अकाउंट बंद होने के मामले की अगली सुनवाई कब तय है?

  4. Q4मध्यम

    हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का फेसबुक अकाउंट बंद करने पर फैसला किस प्रमुख संवैधानिक अधिकार की रक्षा करना चाहता है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने फेसबुक अकाउंट बंद करने के बारे में क्या फैसला दिया?

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ठोस तथ्यात्मक आधार के बिना किसी व्यक्ति का फेसबुक अकाउंट मनमाने ढंग से बंद नहीं करवा सकती।

2. इस मामले में याचिकाकर्ता कौन थे?

याचिकाकर्ता थे पूर्व मुख्य संसदीय सचिव नीरज भारती, बलदेव कुमार (बंटी सिराजी) और पूर्व डिप्टी एडवोकेट जनरल विनय शर्मा।

3. इस मामले की अगली सुनवाई कब है?

अगली सुनवाई 26 नवंबर 2026 को तय है।

सभी स्रोत

इसी विषय, राज्य या परीक्षा की पिछले 30 दिनों की खबरें

राजव्यवस्थाहिमाचल प्रदेशHPPSC HAS: अति महत्वपूर्ण

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय: माल वाहन में अनधिकृत यात्री की मौत पर वाहन मालिक जिम्मेदार

  • मुख्य कानूनी प्रावधान: धारा 147, मोटर वाहन अधिनियम, 1988
  • पहले भुगतान और बाद में वसूली का आदेश देने की शक्ति: केवल सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 142 के तहत
पृष्ठभूमि GK: मोटर वाहन अधिनियम, 1988धारा 147, मोटर वाहन अधिनियम 1988नोडल: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालययह गलती न करें!
4 प्रश्न · 3 मिनटHindustan
सामाजिक मुद्देहिमाचल प्रदेशHPPSC HAS: अति महत्वपूर्ण

हिमाचल: गंभीर बीमारियों के लिए ₹10 लाख का स्वास्थ्य बीमा कवर

  • नोडल निकाय: हिमाचल प्रदेश सरकार
  • लाभार्थी श्रेणियां: गरीब परिवार, IRDP श्रेणी, कम आय वाले लोग
पृष्ठभूमि GK: स्वास्थ्य बीमाहिमकेयर योजनानोडल: हिमाचल प्रदेश सरकारयह गलती न करें!
4 प्रश्न · 2 मिनटHindustan
राजव्यवस्थाUPSC: अति महत्वपूर्ण

SC: 24 घंटे की गिनती औपचारिक गिरफ़्तारी से नहीं, हिरासत में लेने से शुरू होती है

  • संवैधानिक अनुच्छेद: अनुच्छेद 22(2)
  • पेश करने की समय-सीमा: हिरासत से 24 घंटे
नया अपडेटपृष्ठभूमि GK: अनुच्छेद 22अनुच्छेद 22(2)नोडल: भारत का सर्वोच्च न्यायालययह गलती न करें!
4 प्रश्न · 2 मिनटThe HinduIndian ExpressDainik Bhaskar
राजव्यवस्थाUPSC: अति महत्वपूर्ण

₹3,788 करोड़ की FTSC योजना बलात्कार और POCSO मामलों के लिए 2031 तक बढ़ी

  • योजना का नाम: फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों (FTSCs) की केंद्र प्रायोजित योजना
  • क्रियान्वयन करने वाला मंत्रालय: न्याय विभाग (विधि और न्याय मंत्रालय के अधीन)
पृष्ठभूमि GK: केंद्र प्रायोजित योजना (CSS)आपराधिक विधिनोडल: न्याय विभागयह गलती न करें!
4 प्रश्न · 2 मिनटPIBDainik BhaskarThe Hindu
राजव्यवस्थाUPSC: अति महत्वपूर्ण

सर्वोच्च न्यायालय ने सूची II की प्रविष्टि 54 के तहत राज्यों के अतिरिक्त बिक्री कर लगाने के अधिकार को सही ठहराया; संदर्भ को अकादमिक माना, GST के बाद उसका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं

  • GST का पूरा नाम: वस्तु एवं सेवा कर
  • निर्णय देने वाली संस्था: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
पृष्ठभूमि GK: प्रविष्टि 54, सूची II (राज्य सूची)नोडल: भारत का सर्वोच्च न्यायालययह गलती न करें!
4 प्रश्न · 2 मिनटThe HinduHindustan
राजव्यवस्थाUPSC: अति महत्वपूर्ण

सर्वोच्च न्यायालय: मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोक सेवक

  • मुख्य फैसला: मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत एक 'लोक सेवक' है।
  • मामले का मूल: तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के खिलाफ 1976 का गेहूं खरीद भ्रष्टाचार मामला।
पृष्ठभूमि GK: लोक सेवक (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत परिभाषा)भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988नोडल: भारत का सर्वोच्च न्यायालययह गलती न करें!
4 प्रश्न · 2 मिनटThe Hindu