राजव्यवस्था

सर्वोच्च न्यायालय ने दिव्यांगता का पुनर्मूल्यांकन खारिज किया, कम दृष्टि वाली महिला को सिविल जज नियुक्त करने का निर्देश

7 नवंबर 20264 मिनट1 स्रोत4 प्रश्नखबर 18 / 59

प्रिलिम्स के लिए: दिव्यांगजन अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016, संविधान का अनुच्छेद 142, संविधान का अनुच्छेद 32, धारा 59, RPwD अधिनियम, 2016, बेंचमार्क दिव्यांगता वाला व्यक्ति (PwBD), याचिकाकर्ता, प्रमाणित दिव्यांगता (2020), पुनर्मूल्यांकित दिव्यांगता (2026)

मेन्स के लिए: वैधानिक प्रमाणन, निर्णायक निर्धारण, क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण, अनुच्छेद 142 पूर्ण न्याय, RPwD अधिनियम 2016, धारा 59 अपील तंत्र

स्रोत:Indian ExpressIndian Express

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि राजस्थान न्यायिक सेवा नियमों के तहत गठित चिकित्सा बोर्ड किसी अभ्यर्थी की प्रमाणित दिव्यांगता प्रतिशत का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता। कम दृष्टि वाली एक महिला ने राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की थी और सर्वोच्च न्यायालय ने उसे सिविल जज नियुक्त करने का निर्देश दिया था। लेकिन एक बोर्ड ने उसकी दिव्यांगता 40% से घटाकर 30% कर दी, जिससे वह PwBD आरक्षण से बाहर हो गई। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आवेदन को 'तुच्छ' बताया और उसकी नियुक्ति को फिर से पक्का किया।

सारांश

  • रेखा शर्मा, जो कम दृष्टि वाली महिला हैं, को 2020 में दिव्यांगजन अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016 के तहत 40% दिव्यांगता का प्रमाण पत्र मिला था।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 15 अप्रैल 2025 को अनुच्छेद 142 के तहत राजस्थान न्यायिक सेवा में सिविल जज (कनिष्ठ प्रभाग) के पद पर उनकी नियुक्ति का निर्देश दिया।
  • राजस्थान न्यायिक सेवा नियम, 2010 के नियम 25 के तहत गठित एक चिकित्सा बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता का फिर से आकलन कर उसे 30% बताया और उन्हें 'PH श्रेणी में पात्र नहीं' घोषित किया।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को उच्च न्यायालय के आवेदन को 'तुच्छ' बताकर खारिज कर दिया और उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
  • इस मामले से यह कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि दिव्यांगता प्रमाण पत्र को केवल RPwD अधिनियम, 2016 की धारा 59 के तहत अपील से चुनौती दी जा सकती है, किसी फिटनेस आकलन बोर्ड से नहीं।

मुख्य बातें

  • सर्वोच्च न्यायालय का 'तुच्छ' फैसला

    सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के आवेदन को 'अत्यंत तुच्छ' बताकर खारिज किया और रेखा शर्मा को तुरंत सिविल जज नियुक्त करने का निर्देश दिया।

  • चिकित्सा बोर्ड की सीमा से बाहर जाना

    RJSR 2010 के नियम 25 के तहत गठित चिकित्सा बोर्ड ने रेखा की दिव्यांगता को 40% से घटाकर 30% कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यह बोर्ड के अधिकार क्षेत्र से बाहर था, क्योंकि उसे केवल फिटनेस का आकलन करना था, दिव्यांगता प्रतिशत तय करना नहीं।

  • RPwD अधिनियम बनाम सेवा नियम

    इस मामले में RPwD अधिनियम, 2016 के तहत दिव्यांगता प्रमाण पत्र की निर्णायक प्रकृति और राज्य न्यायिक सेवा नियमों के तहत चिकित्सा फिटनेस आकलन के बीच टकराव था।

पृष्ठभूमि

रेखा शर्मा, जो कम दृष्टि वाली महिला हैं, ने राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की। नवंबर 2020 में राज्य के चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग ने उनकी दिव्यांगता 40% प्रमाणित की, जिससे वे RPwD अधिनियम, 2016 के तहत बेंचमार्क दिव्यांगता वाली व्यक्ति के रूप में योग्य बनीं। आरक्षित श्रेणी के न्यूनतम अंक प्राप्त करने के बावजूद उन्हें शुरू में साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के तहत 15 अप्रैल 2025 को उनकी सिविल जज (कनिष्ठ प्रभाग) के पद पर नियुक्ति का निर्देश दिया।

प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव

मूल कानूनी प्रश्न यह है कि क्या राज्य सेवा नियमों के तहत गठित चिकित्सा बोर्ड RPwD अधिनियम के तहत पहले से प्रमाणित दिव्यांगता प्रतिशत का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उच्च न्यायालय के आवेदन को 'तुच्छ' बताकर खारिज करना यह पुष्ट करता है कि दिव्यांगता प्रमाण पत्र एक वैधानिक प्रमाणन है, जो आरक्षण पात्रता सहित सभी उद्देश्यों के लिए निर्णायक है। इसे केवल RPwD अधिनियम की धारा 59 के तहत अपील से चुनौती दी जा सकती है। यह फैसला बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है, ताकि पुनर्मूल्यांकन का अधिकार न रखने वाले प्रशासनिक बोर्ड उन्हें कमज़ोर न कर सकें।

आगे की राह

सर्वोच्च न्यायालय का आदेश राजस्थान उच्च न्यायालय को रेखा की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश देता है। यह मामला उन अन्य राज्यों के लिए नज़ीर बनेगा जहां चिकित्सा बोर्ड ऐसे ही पुनर्मूल्यांकन कर सकते हैं। यह सेवा नियमों के तहत चिकित्सा बोर्डों की क्षेत्राधिकार सीमा स्पष्ट करता है और RPwD अधिनियम के अपीलीय तंत्र के सख्त पालन की ज़रूरत को पुष्ट करता है। भर्ती के दौरान दिव्यांगता के पुनर्मूल्यांकन से जुड़े मामलों को अब अधिक प्रभावी ढंग से चुनौती दी जा सकेगी।

दिव्यांगता आकलन बनाम फिटनेस आकलन

पहलूदिव्यांगता प्रमाणनफिटनेस आकलन
प्राधिकारीRPwD अधिनियम के तहत प्रमाणन प्राधिकारीसेवा नियमों के तहत चिकित्सा बोर्ड
उद्देश्यआरक्षण के लिए दिव्यांगता प्रतिशत तय करनाकर्तव्य निभाने की फिटनेस का आकलन करना
कानूनी आधारRPwD अधिनियम, 2016नियम 25, RJSR 2010

राजस्थान से जुड़ाव

राजस्थान की इन परीक्षाओं के लिए ज़रूरी:RPSC RAS 8/10

पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं

दिव्यांगजन अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016
यह वह केंद्रीय विधान है जिसने दिव्यांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की जगह ली। यह 'बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्ति' को ऐसा व्यक्ति मानता है जिसकी कम से कम 40% दिव्यांगता हो, और शिक्षा तथा रोज़गार में आरक्षण का प्रावधान करता है।
संविधान का अनुच्छेद 142
यह सर्वोच्च न्यायालय को किसी लंबित मामले में 'पूर्ण न्याय' करने के लिए आवश्यक कोई भी डिक्री या आदेश पारित करने का अधिकार देता है। यह कानूनी कमियों को भरने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए इस्तेमाल होने वाली एक व्यापक शक्ति है।
संविधान का अनुच्छेद 32
यह 'संवैधानिक उपचारों का अधिकार' है, जो किसी व्यक्ति को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जाने की अनुमति देता है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसे 'संविधान का हृदय और आत्मा' कहा था।
धारा 59, RPwD अधिनियम, 2016
यह दिव्यांगता प्रमाणन से जुड़े किसी भी प्रमाणन प्राधिकारी के आदेश या निर्णय के विरुद्ध अपील का तंत्र देता है। अपील निर्धारित समय के भीतर निर्दिष्ट अपीलीय प्राधिकारी के पास की जाती है।
बेंचमार्क दिव्यांगता वाला व्यक्ति (PwBD)
RPwD अधिनियम, 2016 की धारा 2(r) में इसे परिभाषित किया गया है: ऐसा व्यक्ति जिसकी किसी निर्दिष्ट दिव्यांगता का कम से कम 40% हो। ऐसे व्यक्ति शिक्षा और सार्वजनिक रोज़गार में आरक्षण लाभ के पात्र होते हैं।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर उत्तर देखने के लिए कार्ड पर क्लिक करें।

परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • यह आंकड़ा याद रखें: रेखा शर्मा की दिव्यांगता 2020 में 40% प्रमाणित हुई और 2026 में 30% पुनर्मूल्यांकित की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्ति का निर्देश 15 अप्रैल 2025 को दिया था।
  • यह नोडल निकाय याद रखें: भारत का सर्वोच्च न्यायालय; दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016।
  • यह कानूनी बिंदु याद रखें: अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय), अनुच्छेद 32 (रिट क्षेत्राधिकार), RPwD अधिनियम, 2016 की धारा 59 (दिव्यांगता प्रमाणन के विरुद्ध अपील), और राजस्थान न्यायिक सेवा नियम, 2010 के नियम 24-26।

यह गलती न करें!

परीक्षक विभिन्न प्राधिकारियों की भूमिकाओं में भ्रम पैदा कर सकते हैं: सेवा नियमों के तहत चिकित्सा बोर्ड 'कर्तव्य निभाने की फिटनेस' का आकलन कर सकता है, लेकिन 'दिव्यांगता प्रतिशत का पुनर्मूल्यांकन' नहीं कर सकता। जाल यह है कि फिटनेस आकलन को दिव्यांगता के वैध पुनर्निर्धारण के रूप में देखा जाए, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से खारिज किया है। साथ ही, दिव्यांगता प्रमाण पत्र को चुनौती देने का एकमात्र तरीका RPwD अधिनियम की धारा 59 के तहत अपील है, सेवा नियमों के तहत चिकित्सा बोर्ड नहीं।

मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु

  • वैधानिक प्रमाणन, निर्णायक निर्धारण, क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण, अनुच्छेद 142 पूर्ण न्याय, RPwD अधिनियम 2016, धारा 59 अपील तंत्र

कहीं अटके? एक टैप में समझें

अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    कौन-सा संवैधानिक अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को किसी मामले में 'पूर्ण न्याय' के लिए आवश्यक कोई भी आदेश पारित करने की शक्ति देता है?

  2. Q2कठिन

    दिव्यांगता पुनर्मूल्यांकन पर हाल के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के तहत कम दृष्टि वाली महिला की सिविल जज के पद पर नियुक्ति का निर्देश दिया।
    2. 2.राजस्थान न्यायिक सेवा नियमों के तहत गठित चिकित्सा बोर्ड आरक्षण के उद्देश्य से अभ्यर्थी की दिव्यांगता प्रतिशत का पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।
    3. 3.दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 59 के तहत अपील ही दिव्यांगता प्रमाण पत्र को चुनौती देने का एकमात्र तरीका है।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3मध्यम

    राजस्थान सरकार के चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग द्वारा 2020 में जारी रेखा शर्मा के प्रमाण पत्र में दिव्यांगता का कितना प्रतिशत दर्ज था?

  4. Q4मध्यम

    रेखा शर्मा के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से स्थापित मुख्य कानूनी सिद्धांत क्या है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. रेखा शर्मा कौन हैं और उन्हें जज बनने के लिए 1.5 साल तक इंतज़ार क्यों करना पड़ा?

रेखा शर्मा कम दृष्टि वाली एक महिला हैं जिन्होंने राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की। अप्रैल 2025 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद, जिसमें उनकी सिविल जज के पद पर नियुक्ति का निर्देश दिया गया था, एक चिकित्सा बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता को 40% से घटाकर 30% कर दिया और उन्हें आरक्षण से बाहर कर दिया। अक्टूबर 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने अंततः उच्च न्यायालय के आवेदन को तुच्छ बताकर खारिज कर दिया।

2. दिव्यांगता के पुनर्मूल्यांकन पर चिकित्सा बोर्डों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या फैसला सुनाया?

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि राज्य सेवा नियमों के तहत गठित चिकित्सा बोर्ड केवल अभ्यर्थी की कर्तव्य निभाने की फिटनेस का आकलन कर सकता है, RPwD अधिनियम, 2016 के तहत पहले से प्रमाणित दिव्यांगता प्रतिशत का पुनर्मूल्यांकन नहीं।

3. इस मामले में कौन-से संवैधानिक अनुच्छेद और कानूनी प्रावधान शामिल थे?

अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय) का उपयोग रेखा की नियुक्ति का निर्देश देने के लिए किया गया, अनुच्छेद 32 (रिट क्षेत्राधिकार) का सहारा पुनर्मूल्यांकन को चुनौती देने के लिए लिया गया, और RPwD अधिनियम, 2016 की धारा 59 दिव्यांगता प्रमाण पत्र के विरुद्ध अपील का तंत्र देती है।

4. RPwD अधिनियम, 2016 के तहत 'बेंचमार्क दिव्यांगता वाला व्यक्ति' कौन है?

बेंचमार्क दिव्यांगता वाला व्यक्ति वह है जिसकी किसी निर्दिष्ट दिव्यांगता का कम से कम 40% हो। ऐसे व्यक्ति शिक्षा और सार्वजनिक रोज़गार में आरक्षण लाभ के पात्र होते हैं।

सभी स्रोत

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