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सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर आपराधिक आरोपों वाले मंत्रियों की नियुक्ति पर दिशा-निर्देश मांगने वाली याचिका ठुकराई, संवैधानिक नैतिकता का हवाला दिया

6 नवंबर 20262 मिनट1 स्रोत4 प्रश्नखबर 30 / 131

प्रिलिम्स के लिए: संविधान का अनुच्छेद 75, संविधान का अनुच्छेद 164, संवैधानिक नैतिकता, शक्तियों का पृथक्करण, पीठ, प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद, मूल सिद्धांत, वर्तमान संदर्भ

मेन्स के लिए: शक्तियों का पृथक्करण, कार्यपालिका का विवेक, राजनीति का अपराधीकरण, संवैधानिक नैतिकता

स्रोत:HindustanHindustan

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को मंत्री बनाने या कैबिनेट विभाग सौंपने से रोकने वाले दिशा-निर्देश बनाने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि 'संवैधानिक नैतिकता' कानूनन बाध्यकारी नहीं है, और मंत्री चुनने में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के विवेक को न्यायिक रूप से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 को व्यावहारिक रूप से लागू करने की मांग की गई थी।

सारांश

  • सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका खारिज कर दी, जिसमें गंभीर आपराधिक आरोपों वाले विधायकों को मंत्री बनने या कैबिनेट विभाग मिलने से रोकने के लिए दिशा-निर्देश मांगे गए थे।
  • न्यायालय ने कहा कि 'संवैधानिक नैतिकता' एक आदर्श है, लागू होने वाला कानून नहीं, और मंत्री नियुक्ति में प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री के विवेक को न्यायिक आदेशों से सीमित नहीं किया जा सकता।
  • न्यायालय ने नोट किया कि आपराधिक कानून का अक्सर राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल होता है, इसलिए अदालतों के लिए यह तय करना व्यावहारिक नहीं कि कौन-सा आरोप किसी को कैबिनेट पद से अयोग्य ठहराए।

मुख्य बातें

  • याचिका खारिज

    शक्तियों के पृथक्करण का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक आरोपों वाले मंत्रियों की नियुक्ति पर दिशा-निर्देश बनाने से इनकार किया।

  • संवैधानिक नैतिकता

    न्यायालय ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता एक मार्गदर्शक सिद्धांत है, कानूनन लागू होने वाला नियम नहीं।

  • कार्यपालिका का विवेक

    न्यायालय ने कहा कि मंत्री नियुक्ति में प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री के विवेक को न्यायिक आदेशों से घटाया नहीं जा सकता।

पृष्ठभूमि

याचिका में ऐसे बाध्यकारी दिशा-निर्देश मांगे गए थे, जिनसे गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे विधायकों को मंत्री पद या अहम विभाग न मिले। इसमें संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 का हवाला दिया गया, जो क्रमशः केंद्रीय और राज्य मंत्रियों की नियुक्ति से जुड़े हैं, लेकिन आपराधिक आरोपों के आधार पर कोई अयोग्यता तय नहीं करते। याचिकाकर्ता का तर्क था कि ऐसे मानदंडों के अभाव में शासन की ईमानदारी कमज़ोर होती है।

प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव

सर्वोच्च न्यायालय के इनकार से शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत मज़बूत होता है। दिशा-निर्देश बनाने से मना करके न्यायालय ने मंत्री नियुक्ति में कार्यपालिका के विवेक को बरकरार रखा। पीठ ने यह भी ध्यान दिलाया कि आपराधिक मामले अक्सर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी दर्ज कराते हैं, इसलिए अदालतों के लिए यह तय करना मुश्किल है कि कौन-से आरोप वास्तव में बाहर रखने का आधार हों। इस फैसले से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों पर अपने विवेक का प्रयोग करने की ज़िम्मेदारी बनी रहती है, जो न्यायिक आदेश के बजाय राजनीतिक और संवैधानिक औचित्य से तय हो।

आगे की राह

अब ज़िम्मेदारी राजनीतिक कार्यपालिका और विधायिका पर है कि वे स्वयं नियमन करें। संसद या राज्य विधानसभाएं जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन या मंत्री नियुक्ति के लिए आचार संहिता बनाने पर विचार कर सकती हैं। जनमत और राजनीतिक जवाबदेही मुख्य अंकुश बने रहेंगे। आपराधिक कानून के राजनीतिक हथियार बनने पर न्यायालय की टिप्पणी यह भी दिखाती है कि नेताओं के खिलाफ तुच्छ मामलों को रोकने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार की ज़रूरत है।

पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं

संविधान का अनुच्छेद 75
प्रधानमंत्री (राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त) और अन्य केंद्रीय मंत्रियों (प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त) की नियुक्ति का प्रावधान करता है। आपराधिक आरोपों के आधार पर अयोग्यता का कोई प्रावधान इसमें नहीं है।
संविधान का अनुच्छेद 164
मुख्यमंत्री (राज्यपाल द्वारा नियुक्त) और अन्य राज्य मंत्रियों (मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल द्वारा नियुक्त) की नियुक्ति का प्रावधान करता है। इसमें आपराधिक पृष्ठभूमि को अयोग्यता के रूप में नहीं रखा गया है।
संवैधानिक नैतिकता
यह संविधान के मूल मूल्यों और भावना के पालन की अवधारणा है, जो उसके शाब्दिक पाठ से अलग है। यह कानूनन लागू होने वाला सिद्धांत नहीं, बल्कि संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है।
शक्तियों का पृथक्करण
इस सिद्धांत के तहत सरकार की तीनों शाखाएं (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। दिशा-निर्देश न बनाने का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला कार्यपालिका के क्षेत्र का सम्मान करने वाले न्यायिक संयम का उदाहरण है।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

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परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • इस आंकड़े पर ध्यान दें: सर्वोच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2026 को जनहित याचिका खारिज की।
  • इस नोडल निकाय पर ध्यान दें: भारत का सर्वोच्च न्यायालय।
  • इस कानूनी बिंदु पर ध्यान दें: भारत के संविधान के अनुच्छेद 75 और 164।

यह गलती न करें!

परीक्षक 'संवैधानिक नैतिकता' को 'संवैधानिक वैधता' या 'संवैधानिक प्रावधानों' से भ्रमित कर सकते हैं। 'संवैधानिक नैतिकता' संवैधानिक संशोधन या कानून की तरह कानूनन बाध्यकारी सिद्धांत नहीं है। साथ ही ध्यान रखें कि सर्वोच्च न्यायालय ने कोई नई अयोग्यता तय नहीं की; उसने केवल दिशा-निर्देश बनाने से इनकार किया।

मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु

  • शक्तियों का पृथक्करण, कार्यपालिका का विवेक, राजनीति का अपराधीकरण, संवैधानिक नैतिकता

कहीं अटके? एक टैप में समझें

अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद केंद्रीय मंत्रियों की नियुक्ति से संबंधित है?

  2. Q2कठिन

    आपराधिक आरोपों वाले मंत्रियों की नियुक्ति पर दिशा-निर्देश मांगने वाली याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर आपराधिक आरोपों वाले व्यक्तियों को मंत्री बनने से रोकने के लिए दिशा-निर्देश बनाए।
    2. 2.न्यायालय ने कहा कि 'संवैधानिक नैतिकता' एक कानूनन बाध्यकारी सिद्धांत है।
    3. 3.पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत शामिल थे।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3मध्यम

    सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक आरोपों वाले मंत्रियों की नियुक्ति के लिए दिशा-निर्देश मांगने वाली याचिका किस तारीख को खारिज की?

  4. Q4मध्यम

    आपराधिक आरोपों वाले मंत्रियों की नियुक्ति पर दिशा-निर्देश बनाने से सर्वोच्च न्यायालय के इनकार का मुख्य निहितार्थ क्या है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. आपराधिक आरोपों वाले व्यक्तियों की मंत्री नियुक्ति पर सर्वोच्च न्यायालय ने क्या फैसला दिया?

सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर आपराधिक आरोपों वाले व्यक्तियों को मंत्री बनने से रोकने के दिशा-निर्देश मांगने वाली याचिका खारिज की। न्यायालय ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता बाध्यकारी नहीं है और कार्यपालिका के विवेक को सीमित नहीं किया जा सकता।

2. इस मामले की सुनवाई करने वाली पीठ में कौन-से न्यायाधीश थे?

पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे।

3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 क्या हैं?

अनुच्छेद 75 केंद्रीय मंत्रियों की नियुक्ति से और अनुच्छेद 164 राज्य मंत्रियों की नियुक्ति से संबंधित है। इनमें से कोई भी अनुच्छेद आपराधिक आरोपों के आधार पर अयोग्यता का प्रावधान नहीं करता।

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