प्रिलिम्स के लिए: पंचांग, सूर्यसिद्धांत, नोडल निकाय, दृष्टि, उपलब्ध कराई जाने वाली डेटा अवधि, पंचांग निर्माताओं के लिए लागत, अध्ययन की गई ऐतिहासिक पद्धति, वर्तमान संदर्भ
मेन्स के लिए: खगोलीय मानकीकरण, परंपरा संरक्षण, सूर्यसिद्धांत का परिष्कार, उदयतिथि निर्धारण
स्रोत:Dainik Bhaskar
Hindustan
वन-डे परीक्षा के 5 तथ्य
SSC, रेलवे, पुलिस और शिक्षक भर्ती में ऐसे ही सीधे सवाल आते हैं।
- लखनऊ का केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय 'एक राष्ट्र, एक पंचांग' डिजिटल पोर्टल विकसित कर रहा है।
- पोर्टल पंजीकृत पंचांग निर्माताओं को 20 महीने का प्रमाणित खगोलीय डेटा निशुल्क देगा।
- अनुसंधान में आचार्य रंगनाथ की 550 वर्ष पुरानी बीजकर्म-संस्कार पद्धति को परिष्कृत किया गया।
- हर साल राष्ट्रीय पंडित परिषद उदयतिथि और पर्व-तिथियों के निर्धारण पर चर्चा करेगी।
- यह पहल पूर्णिमांत और अमांत, दोनों पंचांग परंपराओं को बनाए रखती है।
चर्चा में क्यों?
लखनऊ स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय 'एक राष्ट्र, एक पंचांग' की सोच के तहत एक डिजिटल पोर्टल बना रहा है। इसके ज़रिए देशभर के पंजीकृत पंचांग निर्माताओं को अगले 20 महीने का प्रमाणित खगोलीय डेटा निशुल्क मिलेगा। मकसद पर्व-तिथियों के अंतर को घटाना है, और साथ ही गणना की अलग-अलग परंपराओं को बनाए रखना है।
सारांश
- यह पोर्टल 'एक राष्ट्र, एक पंचांग' पहल के तहत लखनऊ स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का परिसर विकसित कर रहा है।
- पंजीकृत पंचांग निर्माताओं को तिथि, नक्षत्र, योग, करण, ग्रहों की स्थिति, सूर्योदय-सूर्यास्त के समय और दिन-रात की अवधि का 20 महीने का प्रमाणित डेटा मिलेगा।
- इस पहल का उद्देश्य पूर्णिमांत और अमांत जैसी अलग-अलग पंचांग परंपराओं को खत्म किए बिना प्रमाणित खगोलीय गणनाओं में समन्वय स्थापित करना है।
मुख्य बातें
एक राष्ट्र, एक पंचांग पोर्टल
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ पंचांग निर्माताओं को प्रमाणित खगोलीय डेटा देने के लिए डिजिटल पोर्टल बना रहा है, ताकि पूरे देश में पर्व-तिथियों को लेकर भ्रम कम हो।
550 वर्ष पुरानी गणना पद्धति का परिष्कार
विश्वविद्यालय ने लगभग 550 वर्ष पुरानी आचार्य रंगनाथ की बीजकर्म-संस्कार पद्धति का अध्ययन और परिष्कार किया, ताकि ग्रहों की स्थिति अधिक सटीक निकल सके।
परंपराओं का संरक्षण, उन्हें खत्म करना नहीं
इस पहल का लक्ष्य पूर्णिमांत और अमांत परंपराओं में प्रमाणित गणनाओं में समन्वय लाना है, किसी एक पद्धति को थोपना या कोई पंचांग परंपरा खत्म करना नहीं।
पृष्ठभूमि
भारत में अलग-अलग ऋषि परंपराओं, गणना पद्धतियों और ग्रह सारिणियों के आधार पर कई पंचांग चलते हैं। इसी कारण एक ही स्थान के लिए पर्व-तिथियों, ग्रहों की स्थिति और सूर्योदय-सूर्यास्त के समय में अंतर दिखता है और भ्रम पैदा होता है। इस समस्या पर केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ 2022 से अनुसंधान कर रहा है।
प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव
पोर्टल पंजीकृत पंचांग निर्माताओं को हर साल निशुल्क प्रमाणित खगोलीय डेटा देगा, जिसमें तिथि, नक्षत्र, योग, करण, ग्रहों की गति और सूर्योदय-सूर्यास्त शामिल होंगे। अनुसंधान में आचार्य रंगनाथ की 550 वर्ष पुरानी बीजकर्म-संस्कार पद्धति को परिष्कृत किया गया। सूर्यसिद्धांत की पारंपरिक गणना को भी आधुनिक खगोलीय प्रेक्षणों से जांचा गया है। इसके निष्कर्ष सूर्यसिद्धांत के आगामी प्रामाणिक संस्करण में शामिल किए जा सकते हैं।
आगे की राह
उदयतिथि और पर्व-तिथियों के निर्धारण पर चर्चा के लिए हर साल राष्ट्रीय पंडित परिषद या विद्वत सम्मेलन आयोजित होगा। इसमें ज्योतिषाचार्य, पंचांग निर्माता और धर्मशास्त्र विशेषज्ञ एक साथ बैठेंगे। इस पहल से पंचांग की विविध परंपराएं (पूर्णिमांत, अमांत) बनी रहेंगी, जबकि उनके आधार पर इस्तेमाल होने वाला खगोलीय डेटा प्रमाणित और एकसमान होगा।
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पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं
- पंचांग
- हिंदू पंचांग, जो खगोलीय और ज्योतिषीय आंकड़े देता है, जिनमें तिथि (चंद्र दिवस), वार, नक्षत्र (तारामंडल), योग (शुभ अवधि) और करण (आधा दिन) शामिल हैं। इनसे पर्व-तिथियां और शुभ मुहूर्त तय होते हैं।
- सूर्यसिद्धांत
- एक प्राचीन भारतीय खगोलीय ग्रंथ, जो पारंपरिक हिंदू पंचांग गणना का आधार है। यह भारतीय खगोल विज्ञान के मूल ग्रंथों में गिना जाता है (ज्योतिष वेदांग)।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य
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परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- इस डेटा पर ध्यान दें: पंचांग निर्माताओं के लिए 20 महीने का निशुल्क खगोलीय डेटा
- इस नोडल निकाय पर ध्यान दें: केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर
यह गलती न करें!
यह पहल सभी पंचांगों को एक में मिलाने की नहीं है। यह कई परंपराओं को बनाए रखते हुए एक साझा प्रमाणित खगोलीय डेटाबेस देती है। 'एक राष्ट्र, एक पंचांग' को क्षेत्रीय पंचांग विविधता खत्म करने के अर्थ में न समझें।
मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु
- खगोलीय मानकीकरण, परंपरा संरक्षण, सूर्यसिद्धांत का परिष्कार, उदयतिथि निर्धारण
कहीं अटके? एक टैप में समझें
भारत में अलग-अलग पंचांगों में एक ही पर्व की तिथि अक्सर अलग दिखती है, क्योंकि उनकी गणना पद्धतियां अलग हैं। लखनऊ का केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ऐसी वेबसाइट बना रहा है, जहां से पंचांग निर्माता 20 महीने का प्रमाणित खगोलीय डेटा निशुल्क डाउनलोड कर सकेंगे। इससे भ्रम कम होगा और क्षेत्रीय परंपराएं भी बनी रहेंगी।
- लखनऊ का केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय 'एक राष्ट्र, एक पंचांग' डिजिटल पोर्टल विकसित कर रहा है।
- पोर्टल पंजीकृत पंचांग निर्माताओं को 20 महीने का प्रमाणित खगोलीय डेटा निशुल्क देगा।
- अनुसंधान में आचार्य रंगनाथ की 550 वर्ष पुरानी बीजकर्म-संस्कार पद्धति को परिष्कृत किया गया।
- हर साल राष्ट्रीय पंडित परिषद उदयतिथि और पर्व-तिथियों के निर्धारण पर चर्चा करेगी।
- यह पहल पूर्णिमांत और अमांत, दोनों पंचांग परंपराओं को बनाए रखती है।
- संस्कृति: भारतीय खगोल विज्ञान और कैलेंडर प्रणालियां
- शासन: सांस्कृतिक मानकीकरण की पहल
जुड़ी अवधारणाएँ: पंचांग, सूर्यसिद्धांत
अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1आसान
'एक राष्ट्र, एक पंचांग' डिजिटल पोर्टल कौन-सा विश्वविद्यालय विकसित कर रहा है?
व्याख्या: इस पोर्टल को लखनऊ के केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का परिसर 'एक राष्ट्र, एक पंचांग' की सोच के तहत विकसित कर रहा है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय इस खास पहल में शामिल नहीं हैं।
- Q2कठिन
'एक राष्ट्र, एक पंचांग' पहल के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.यह पोर्टल पंजीकृत पंचांग निर्माताओं को 20 महीने का निशुल्क खगोलीय डेटा देगा।
- 2.इस पहल का उद्देश्य सभी मौजूदा पंचांग परंपराओं को खत्म करना और एक ही गणना पद्धति थोपना है।
- 3.अनुसंधान में आचार्य रंगनाथ की 550 वर्ष पुरानी बीजकर्म-संस्कार पद्धति को परिष्कृत किया गया।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 सही है, क्योंकि पोर्टल 20 महीने का खगोलीय डेटा निशुल्क देगा। कथन 2 गलत है, क्योंकि पहल स्पष्ट रूप से पूर्णिमांत और अमांत जैसी परंपराओं को बनाए रखने के लिए है, उन्हें खत्म करने के लिए नहीं। कथन 3 सही है, क्योंकि विश्वविद्यालय ने लगभग 550 वर्ष पुरानी आचार्य रंगनाथ की पद्धति का अध्ययन और परिष्कार किया।
- Q3मध्यम
'एक राष्ट्र, एक पंचांग' पोर्टल पंचांग निर्माताओं को खगोलीय डेटा कितने महीने का उपलब्ध कराएगा?
व्याख्या: पोर्टल अगले 20 महीने के लिए प्रमाणित खगोलीय डेटा उपलब्ध कराएगा।
- Q4मध्यम
'एक राष्ट्र, एक पंचांग' पहल का मुख्य उद्देश्य क्या है?
व्याख्या: यह पहल प्रमाणित खगोलीय डेटा देकर पर्व-तिथियों के अंतर को घटाने का लक्ष्य रखती है, और पूर्णिमांत व अमांत जैसी परंपराओं को बनाए रखती है। यह एक ही अनिवार्य पंचांग नहीं बनाती, हिंदू कैलेंडर की जगह नहीं लेती, और पंचांग निर्माताओं से शुल्क नहीं लेती (डेटा निशुल्क है)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. 'एक राष्ट्र, एक पंचांग' पहल क्या है?
यह एक डिजिटल पोर्टल है, जिसे लखनऊ के केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का परिसर विकसित कर रहा है। इसके ज़रिए देशभर के पंजीकृत पंचांग निर्माताओं को अगले 20 महीने का प्रमाणित खगोलीय डेटा निशुल्क मिलेगा, ताकि पर्व-तिथियों के अंतर को घटाया जा सके।
2. पंचांग पोर्टल कौन-सा विश्वविद्यालय विकसित कर रहा है?
लखनऊ स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का परिसर 'एक राष्ट्र, एक पंचांग' डिजिटल पोर्टल विकसित कर रहा है।
3. पंचांग पोर्टल पर कौन-सा डेटा उपलब्ध होगा?
पोर्टल पर 20 महीने के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, ग्रहों की स्थिति, वक्री और मार्गी गति, सूर्योदय-सूर्यास्त के समय और दिन-रात की अवधि का डेटा मिलेगा।
4. क्या यह पहल क्षेत्रीय पंचांग परंपराओं को खत्म कर देगी?
नहीं, यह पहल पूर्णिमांत और अमांत जैसी परंपराओं को बनाए रखते हुए प्रमाणित खगोलीय गणनाओं में समन्वय लाने के लिए है। यह किसी एक पद्धति को थोपने या कोई परंपरा खत्म करने के लिए नहीं है।
