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सर्वोच्च न्यायालय ने उन संवैधानिक पदाधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभ न देने के सवाल पर केंद्र से जवाब मांगा, जो हटाए जाने से बचने के लिए इस्तीफा देते हैं

5 नवंबर 20262 मिनट1 स्रोत4 प्रश्नखबर 19 / 134

प्रिलिम्स के लिए: न्यायाधीशों पर महाभियोग, संवैधानिक पद, इस्तीफा बनाम हटाया जाना, याचिकाकर्ता, पीठ, सॉलिसिटर जनरल, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश, प्रमुख पूर्व दृष्टांत मामला

मेन्स के लिए: संस्थागत जवाबदेही, न्यायिक सत्यनिष्ठा, प्रक्रिया का दुरुपयोग, महाभियोग तंत्र, संवैधानिक नैतिकता

स्रोत:HindustanHindustan

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने उस जनहित याचिका पर केंद्र का जवाब मांगा है, जिसमें मांग की गई है कि हटाने की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद के सभी लाभ और सुविधाएं न दी जाएं। इस मामले की अहमियत इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के इस्तीफे से बढ़ जाती है, जिनके सरकारी आवास पर जली हुई नोटों की गड्डियां मिली थीं।

सारांश

  • सर्वोच्च न्यायालय ने उन संवैधानिक पदाधिकारियों की सेवानिवृत्ति सुविधाएं रोकने की जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा, जो हटाए जाने की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देते हैं।
  • प्रतीक वीरा की याचिका में तर्क दिया गया है कि हटाने या महाभियोग की कार्यवाही के दौरान इस्तीफा देने वाले अधिकारियों को उस संवैधानिक पद से जुड़ी सुविधाओं का हक नहीं मिलना चाहिए।
  • यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा से जुड़ा है, जिन्होंने दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर जली हुई नोटों की गड्डियां मिलने के बाद इस्तीफा दे दिया था, जिससे महाभियोग की प्रक्रिया निष्प्रभावी हो गई।

मुख्य बातें

  • सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र का रुख मांगा

    सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से उस जनहित याचिका पर हलफनामा दाखिल करने को कहा है, जिसमें हटाए जाने से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ न देने की मांग है।

  • मूल कानूनी प्रश्न

    क्या महाभियोग या हटाने की कार्यवाही के दौरान इस्तीफा देने वाले अधिकारियों को उस संवैधानिक पद से जुड़ी पेंशन, सुविधाएं और अन्य लाभ गंवाने चाहिए?

  • मूल मामला: न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा

    याचिका में उस पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश का उदाहरण दिया गया है, जिन्होंने अपने घर से जली हुई नकदी मिलने के बाद इस्तीफा दिया था, जिससे लोकसभा में महाभियोग की प्रक्रिया रुक गई।

पृष्ठभूमि

संवैधानिक पदों (न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, नियंत्रक-महालेखा परीक्षक आदि) का कार्यकाल निश्चित होता है और न्यायाधीशों को केवल कठोर महाभियोग प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए यह अनुच्छेद 124(4) के तहत और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अनुच्छेद 217 के साथ न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत होती है। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों में आम तौर पर पेंशन, चिकित्सा सुविधा, सरकारी आवास और सुरक्षा शामिल होते हैं। याचिका का तर्क है कि हटाने की कार्यवाही के दौरान इस्तीफा देकर इन लाभों को बनाए रखना प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव

यह मामला जवाबदेही का एक अहम सवाल उठाता है: क्या कोई संवैधानिक पदाधिकारी इस्तीफा देकर जांच से बच सकता है और फिर भी आजीवन लाभ का दावा कर सकता है? यदि अदालत याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देती है, तो यह मिसाल बन सकती है कि हटाने की कार्यवाही के दौरान दिया गया इस्तीफा 'हटाया गया माना जाए' और अधिकारी के सभी लाभ रुक जाएं। इससे संस्थागत जवाबदेही मज़बूत होगी और कदाचार पर रोक लगेगी।

आगे की राह

केंद्र दिवाली के अवकाश के बाद अपना जवाब दाखिल करेगा। इसके बाद अदालत मामले के गुण-दोष पर सुनवाई करेगी। एक संभावित परिणाम यह हो सकता है कि अदालत लंबित हटाने की कार्यवाही के दौरान दिए गए इस्तीफे पर सभी सेवानिवृत्ति लाभ रोकने का नियम तय करे, या संसद को इस विषय पर कानून बनाने का निर्देश दे। यह मामला संसद में लंबित महाभियोग प्रस्तावों को भी प्रभावित कर सकता है।

पृष्ठभूमि GK

इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं

न्यायाधीशों पर महाभियोग
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अनुच्छेद 124(4) (और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अनुच्छेद 217) तथा न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया। हटाने के लिए संसद के प्रत्येक सदन में सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई के समर्थन से संबोधन पारित होना आवश्यक है।
संवैधानिक पद
भारत के संविधान द्वारा सृजित पद, जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, नियंत्रक-महालेखा परीक्षक, राज्यपाल आदि, जिनका निश्चित कार्यकाल और विशेष संरक्षण होता है।
इस्तीफा बनाम हटाया जाना
इस्तीफा पद का स्वैच्छिक त्याग है, जबकि हटाया जाना महाभियोग या किसी अन्य संवैधानिक प्रक्रिया के ज़रिए की गई अनिवार्य कार्रवाई है। याचिका उस चलन को चुनौती देती है, जिसमें हटाए जाने से पहले इस्तीफा देकर लाभ भी बनाए रखे जाते हैं।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर उत्तर देखने के लिए कार्ड पर क्लिक करें।

परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा

  • इस आंकड़े पर ध्यान दें: प्रतीक वीरा द्वारा दायर जनहित याचिका; इससे जुड़ा मामला पूर्व इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा का है (मार्च 2025 में इस्तीफा)
  • इस नोडल निकाय पर ध्यान दें: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
  • इस कानूनी बिंदु पर ध्यान दें: अनुच्छेद 124(4) - न्यायाधीशों पर महाभियोग

यह गलती न करें!

परीक्षक 'इस्तीफे' को 'सेवानिवृत्ति' या 'हटाए जाने' से भ्रमित कर सकते हैं। याद रखें: इस्तीफा स्वैच्छिक होता है, सेवानिवृत्ति आयु पर आधारित होती है और हटाना एक दंडात्मक प्रक्रिया है। याचिका केवल हटाने की कार्यवाही के दौरान दिए गए इस्तीफों को लक्षित करती है, सभी इस्तीफों को नहीं। साथ ही, मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष है, पूर्ण न्यायालय के समक्ष नहीं।

मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु

  • संस्थागत जवाबदेही, न्यायिक सत्यनिष्ठा, प्रक्रिया का दुरुपयोग, महाभियोग तंत्र, संवैधानिक नैतिकता

कहीं अटके? एक टैप में समझें

अभ्यास प्रश्न

उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।

  1. Q1आसान

    सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया संविधान के किस अनुच्छेद में दी गई है?

  2. Q2कठिन

    निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. 1.सर्वोच्च न्यायालय ने उस जनहित याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है, जिसमें हटाने की कार्यवाही से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद के लाभ न देने की मांग है।
    2. 2.यह जनहित याचिका पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने दायर की है।
    3. 3.इस मामले की सुनवाई करने वाली पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

    ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  3. Q3मध्यम

    इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने किस वर्ष इस्तीफा दिया था, जब उनके सरकारी आवास पर जली हुई नोटों की गड्डियां मिली थीं?

  4. Q4मध्यम

    सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका द्वारा उठाया गया मुख्य कानूनी प्रश्न क्या है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका किस बारे में है?

प्रतीक वीरा द्वारा दायर इस जनहित याचिका में मांग है कि हटाने या महाभियोग की कार्यवाही से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को उस पद से जुड़े सभी सेवानिवृत्ति लाभ और सुविधाएं न दी जाएं।

2. सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई कौन कर रहा है?

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ कर रही है।

3. इस जनहित याचिका को किस घटना ने जन्म दिया?

याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के इस्तीफे का ज़िक्र है, जो मार्च 2025 में दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर जली हुई नोटों की गड्डियां मिलने के बाद दिया गया था और जिससे महाभियोग प्रक्रिया निष्प्रभावी हो गई।

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