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प्रिलिम्स के लिए: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, पूर्णता प्रमाणपत्र, जनहित याचिका (PIL), नोडल निकाय, शामिल अधिनियम, पीठ की संरचना, वर्तमान संदर्भ
मेन्स के लिए: सार्वभौमिक डिज़ाइन, सामाजिक समावेशन, बाधा-मुक्त वातावरण, उचित समायोजन
स्रोत:
Hindustan
वन-डे परीक्षा के 5 तथ्य
SSC, रेलवे, पुलिस और शिक्षक भर्ती में ऐसे ही सीधे सवाल आते हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने आवासीय भवनों में दिव्यांगजनों की सुगम पहुंच से जुड़ी याचिका पर नोटिस जारी किया।
- सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस का जवाब देने के लिए केंद्र को चार सप्ताह दिए गए हैं।
- याचिका में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का हवाला दिया गया है।
- पीठ में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह शामिल थे।
- याचिका का तर्क है कि सुगमता के पालन के बिना पूर्णता प्रमाणपत्र नहीं दिया जाना चाहिए।
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने देश भर की आवासीय इमारतों में दिव्यांगजनों के लिए सुगम पहुंच के मानकों को लागू करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। याचिका का तर्क है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के पालन के बिना किसी भी प्रतिष्ठान को पूर्णता प्रमाणपत्र नहीं दिया जाना चाहिए।
सारांश
- सर्वोच्च न्यायालय ने आवासीय भवनों में दिव्यांगजनों की सुगम पहुंच से जुड़ी याचिका पर केंद्र से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
- याचिका का तर्क है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत कोई भी प्रतिष्ठान सुगम पहुंच के मानकों का पालन किए बिना पूर्णता प्रमाणपत्र नहीं पा सकता।
- कोर्ट ने जिस याचिका पर नोटिस जारी किया, उसमें कहा गया है कि आवासीय इमारतों, अपार्टमेंट परिसरों और ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं में सुगम पहुंच की उचित सुविधाएं नहीं हैं, जिससे दिव्यांगजन अपने घरों का स्वतंत्र रूप से उपयोग नहीं कर पाते।
मुख्य बातें
सुगम पहुंच पर सर्वोच्च न्यायालय का नोटिस
सर्वोच्च न्यायालय ने आवासीय भवनों में दिव्यांगजनों के लिए सुगम पहुंच मानकों को लागू करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया।
मुख्य मुद्दा
आवासीय इमारतों, अपार्टमेंट और ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में सुगम पहुंच की उचित सुविधाएं नहीं हैं, जो दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का उल्लंघन है।
कानूनी आधार
याचिका का तर्क है कि 2016 के अधिनियम के तहत सुगम पहुंच मानकों का पालन किए बिना कोई भी प्रतिष्ठान पूर्णता प्रमाणपत्र नहीं पा सकता।
पृष्ठभूमि
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 को दिव्यांगजनों के अधिकारों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन को लागू करने के लिए बनाया गया था। यह सार्वजनिक और निजी भवनों, परिवहन और सेवाओं में सुगमता को अनिवार्य करता है। इसके बावजूद क्रियान्वयन कमज़ोर रहा है, खासकर आवासीय क्षेत्र में, जहां बिल्डर अक्सर सुगमता के नियमों की अनदेखी करते हैं।
प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव
यह मामला RPwD अधिनियम, 2016 के प्रवर्तन की परीक्षा लेता है। यदि कोर्ट पूर्णता प्रमाणपत्र के लिए सख्त अनुपालन अनिवार्य करता है, तो डेवलपर्स को रैंप, चौड़े दरवाज़े और सुगम शौचालय जैसी सुविधाएं देने के लिए बाध्य किया जा सकता है। इससे भारत के अनुमानित 2.68 करोड़ दिव्यांगजनों (वर्ष 2011 की जनगणना) के जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।
आगे की राह
चार सप्ताह में केंद्र का जवाब सरकार की प्रवर्तन पर स्थिति स्पष्ट करेगा। कोर्ट अनुपालन की समय-सीमा तय कर सकता है या राज्यों को सुगमता ऑडिट लागू करने का निर्देश दे सकता है। यह मामला सभी नए निर्माण परियोजनाओं में सार्वभौमिक पहुंच के लिए व्यापक ढांचे का आधार बन सकता है।
पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016
- एक भारतीय कानून, जिसने दिव्यांगजन अधिनियम, 1995 की जगह ली। इसमें दिव्यांगता के प्रकार 7 से बढ़ाकर 21 किए गए, सुगमता को अनिवार्य किया गया, शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण का प्रावधान किया गया और शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की गई।
- पूर्णता प्रमाणपत्र
- स्थानीय नगरपालिका प्राधिकरण द्वारा जारी वह प्रमाणपत्र, जो भवन स्वीकृत नक्शों के अनुसार बनने और सभी भवन उपविधियों का पालन करने के बाद दिया जाता है। पानी, बिजली और कब्ज़े (आक्युपेंसी) के लिए यह ज़रूरी है।
- जनहित याचिका (PIL)
- जनहित या आम हित के संरक्षण के लिए अदालत में शुरू की गई कानूनी कार्रवाई, जिसमें जनता या समुदाय के किसी वर्ग का आर्थिक हित हो या उनके कानूनी अधिकार या दायित्व प्रभावित होते हों।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य
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परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- इस आंकड़े पर ध्यान दें: आवासीय भवनों में सुगम पहुंच पर सर्वोच्च न्यायालय ने नोटिस जारी किया; केंद्र के जवाब के लिए चार सप्ताह दिए गए
- इस नोडल निकाय पर ध्यान दें: सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय
- इस कानूनी बिंदु पर ध्यान दें: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016
यह गलती न करें!
परीक्षक 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' की जगह पुराने 'दिव्यांगजन अधिनियम, 1995' का नाम दे सकते हैं, या मान्यता प्राप्त दिव्यांगता प्रकारों की संख्या को लेकर भ्रम पैदा कर सकते हैं (2016 के अधिनियम में 21, 1995 के अधिनियम में 7)।
मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु
- सार्वभौमिक डिज़ाइन, सामाजिक समावेशन, बाधा-मुक्त वातावरण, उचित समायोजन
कहीं अटके? एक टैप में समझें
सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि भारत की कई आवासीय इमारतों में रैंप, चौड़े दरवाज़े या दिव्यांगजनों के लिए ज़रूरी अन्य सुविधाएं नहीं हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार से चार सप्ताह में बताने को कहा है कि इस पर वह क्या कर रही है। याचिका 2016 के एक कानून पर आधारित है, जिसके तहत सभी इमारतों का दिव्यांगजनों के लिए सुगम होना ज़रूरी है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने आवासीय भवनों में दिव्यांगजनों की सुगम पहुंच से जुड़ी याचिका पर नोटिस जारी किया।
- सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस का जवाब देने के लिए केंद्र को चार सप्ताह दिए गए हैं।
- याचिका में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का हवाला दिया गया है।
- पीठ में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह शामिल थे।
- याचिका का तर्क है कि सुगमता के पालन के बिना पूर्णता प्रमाणपत्र नहीं दिया जाना चाहिए।
- राजव्यवस्था: न्यायपालिका और जनहित याचिका
- शासन: सामाजिक न्याय और दिव्यांगजन अधिकार
जुड़ी अवधारणाएँ: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, पूर्णता प्रमाणपत्र, जनहित याचिका (PIL)
अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1आसान
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के क्रियान्वयन की मुख्य ज़िम्मेदारी किस मंत्रालय की है?
व्याख्या: सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का नोडल मंत्रालय है। विधि और न्याय मंत्रालय कानूनी मामले देखता है, क्रियान्वयन नहीं। आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय भवन नियमों से जुड़ा है, दिव्यांगजन अधिकारों से नहीं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय स्वास्थ्य सेवाएं देखता है, दिव्यांगजन अधिकारों का प्रवर्तन नहीं।
- Q2कठिन
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.सर्वोच्च न्यायालय ने आवासीय भवनों में दिव्यांगजनों के लिए सुगम पहुंच की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।
- 2.याचिका का तर्क है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 1995 सुगमता मानकों को अनिवार्य करता है।
- 3.कोर्ट ने नोटिस पर जवाब देने के लिए केंद्र को चार सप्ताह दिए।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 सही है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने आवासीय भवनों में सुगमता से जुड़ी याचिका पर नोटिस जारी किया। कथन 2 गलत है, क्योंकि याचिका 1995 के नहीं, बल्कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 पर आधारित है। कथन 3 सही है, क्योंकि कोर्ट ने केंद्र को जवाब के लिए चार सप्ताह दिए। अतः विकल्प C सही है।
- Q3मध्यम
सर्वोच्च न्यायालय ने नोटिस पर जवाब देने के लिए केंद्र को कितना समय दिया?
व्याख्या: सर्वोच्च न्यायालय ने नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा। दो सप्ताह सरकारी जवाब के लिए बहुत कम हैं। छह और आठ सप्ताह कोर्ट द्वारा दी गई अवधि से लंबे हैं।
- Q4मध्यम
आवासीय भवनों से जुड़ी सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका का मुख्य उद्देश्य क्या है?
व्याख्या: याचिका में मांग है कि सुगमता मानक लागू हों, ताकि दिव्यांगजन अपने घरों का स्वतंत्र उपयोग कर सकें। निर्माण लागत घटाना याचिका का उद्देश्य नहीं है। आवासीय भवनों की संख्या बढ़ाने का इससे कोई संबंध नहीं है। याचिका में घर खरीदने के लिए वित्तीय सहायता की मांग नहीं की गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. आवासीय भवनों में सुगम पहुंच पर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से क्या मांगा?
सर्वोच्च न्यायालय ने आवासीय भवनों में दिव्यांगजनों के लिए सुगमता मानकों को लागू करने की मांग वाली याचिका पर नोटिस जारी किया और केंद्र को जवाब के लिए चार सप्ताह दिए।
2. आवासीय भवनों में सुगम पहुंच से जुड़ी याचिका में किस अधिनियम का हवाला दिया गया है?
याचिका में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का हवाला दिया गया है, जो सभी प्रतिष्ठानों के लिए सुगमता मानक अनिवार्य करता है।
3. आवासीय भवनों में सुगम पहुंच से जुड़ी याचिका की सुनवाई किसने की?
आवासीय भवनों में सुगम पहुंच से जुड़ी याचिका की सुनवाई किसने की?: याचिका की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने की।
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मूल खबर5 नवंबर 2026 · खबर पढ़ें
