प्रिलिम्स के लिए: बारिश-आधारित कृषि, मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार, भूजल पुनर्भरण, अनुमानित पैदावार में गिरावट, प्रभावित फसलें, प्रमुख सिफारिशें, शिखर सम्मेलन की मेज़बानी, शिखर सम्मेलन का विषय
मेन्स के लिए: बारिश-आधारित खेती की संवेदनशीलता, मृदा पुनरुद्धार आधारित खेती, जलवायु-सहनशील खेती
स्रोत:
Hindustan
वन-डे परीक्षा के 5 तथ्य
SSC, रेलवे, पुलिस और शिक्षक भर्ती में ऐसे ही सीधे सवाल आते हैं।
- जलवायु परिवर्तन से 2050 तक बारिश-आधारित धान और गेहूं की पैदावार अधिकतम 20% तक घट सकती है।
- वैज्ञानिक मृदा पुनरुद्धार आधारित खेती, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण की सिफारिश करते हैं।
- IIT कानपुर ने मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित खेती पर शिखर सम्मेलन आयोजित किया।
- इन पहलों से 5,000 एकड़ क्षेत्र में 8,000 से अधिक किसान जुड़े हैं।
- इन पहलों से करीब 1.3 करोड़ लीटर भूजल बचाया गया है।
चर्चा में क्यों?
वैज्ञानिकों ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन से 2050 तक बारिश-आधारित धान और गेहूं की पैदावार 20% तक घट सकती है। इसके असर को कम करने के लिए वे मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित खेती, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाने की सिफारिश करते हैं। उनके अनुसंधान पर आधारित एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी।
सारांश
- जलवायु परिवर्तन से 2050 तक बारिश-आधारित धान और गेहूं की पैदावार में 20% की गिरावट होने का अनुमान है।
- सुझाए गए समाधानों में मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित खेती, जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियां शामिल हैं।
- IIT कानपुर ने 'जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम करने के लिए मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित कृषि, जल और ऊर्जा' विषय पर शिखर सम्मेलन आयोजित किया।
मुख्य बातें
मृदा पुनरुद्धार पर ज़ोर
वैज्ञानिक मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित खेती को एक प्रमुख समाधान के रूप में आगे बढ़ाने की वकालत करते हैं।
जल संरक्षण पर ज़ोर
जलवायु प्रभावों से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण की सिफारिश की गई है।
पृष्ठभूमि
बारिश-आधारित खेती मानसून की वर्षा पर निर्भर रहती है, इसलिए यह जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील है। भारत में बारिश-आधारित खेती का क्षेत्रफल बड़ा है और धान तथा गेहूं प्रमुख मुख्य फसलें हैं। 2050 तक 20% की पैदावार गिरावट खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका के लिए खतरा होगी, खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में।
प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव
यह चेतावनी IIT कानपुर सहित कई वैज्ञानिकों की ओर से आई है। उनका कहना है कि मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित खेती से मिट्टी की गुणवत्ता और जल धारण क्षमता बढ़ सकती है। उनकी पहलों से 5,000 एकड़ क्षेत्र में 8,000 से अधिक किसान जुड़े हैं और करीब 1.3 करोड़ लीटर भूजल बचाया जा रहा है। इससे साफ है कि व्यावहारिक और विस्तार योग्य समाधान मौजूद हैं, पर उन्हें नीतिगत समर्थन की ज़रूरत है।
आगे की राह
वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार पर आधारित एक विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी। विशेषज्ञ विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नीति के समन्वित उपयोग की मांग कर रहे हैं, और वैज्ञानिक ज्ञान को खेतों तक पहुंचाने के लिए विशेष योजना लागू करने पर ज़ोर दे रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पुनर्योजी कृषि, टिकाऊ जल प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा को प्राथमिकता देना ज़रूरी है।
पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं
- बारिश-आधारित कृषि
- ऐसी खेती जो सिंचाई के बिना पूरी तरह वर्षा के पानी पर निर्भर होती है। यह उन क्षेत्रों में आम है जहां मानसून की वर्षा पर्याप्त होती है, और धान, बाजरा तथा दलहन जैसी फसलों को सहारा देती है।
- मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार
- ऐसी पद्धतियां जो जैविक पदार्थ, आवरण फसलें और कम जुताई जैसे उपायों से मिट्टी के स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों को फिर से बहाल करती हैं, ताकि जल धारण और कार्बन भंडारण बढ़ सके।
- भूजल पुनर्भरण
- वर्षा जल संचयन, परकोलेशन टैंक और चेक डैम जैसे प्राकृतिक या कृत्रिम साधनों से भूमिगत जलभृतों को फिर से भरने की प्रक्रिया।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य
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परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- यह आंकड़ा याद रखें: 2050 तक बारिश-आधारित धान और गेहूं की पैदावार में अधिकतम 20% गिरावट
- यह नोडल निकाय याद रखें: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय / कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय
यह गलती न करें!
20% की गिरावट केवल बारिश-आधारित धान और गेहूं पर लागू होती है, सभी धान और गेहूं पर नहीं। यह 2050 तक का अनुमान है, तत्काल या वर्तमान गिरावट नहीं। इसे कुल कृषि GDP या सिंचित फसलों की पैदावार से न जोड़ें।
मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु
- बारिश-आधारित खेती की संवेदनशीलता, मृदा पुनरुद्धार आधारित खेती, जलवायु-सहनशील खेती
कहीं अटके? एक टैप में समझें
IIT कानपुर सहित कई संस्थानों के वैज्ञानिकों ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन से 2050 तक बिना सिंचाई उगाए जाने वाले धान और गेहूं की पैदावार 20% तक घट सकती है। इसे रोकने के लिए वे मिट्टी का स्वास्थ्य सुधारने, वर्षा जल संचयन और पर्यावरण-अनुकूल खेती अपनाने का सुझाव देते हैं। इन पद्धतियों से पहले ही काफी भूजल बचाया गया है और हज़ारों किसानों को लाभ हुआ है।
- जलवायु परिवर्तन से 2050 तक बारिश-आधारित धान और गेहूं की पैदावार अधिकतम 20% तक घट सकती है।
- वैज्ञानिक मृदा पुनरुद्धार आधारित खेती, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण की सिफारिश करते हैं।
- IIT कानपुर ने मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित खेती पर शिखर सम्मेलन आयोजित किया।
- इन पहलों से 5,000 एकड़ क्षेत्र में 8,000 से अधिक किसान जुड़े हैं।
- इन पहलों से करीब 1.3 करोड़ लीटर भूजल बचाया गया है।
- पर्यावरण: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और अनुकूलन
- कृषि: बारिश-आधारित खेती और टिकाऊ कृषि
जुड़ी अवधारणाएँ: बारिश-आधारित कृषि, मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार, भूजल पुनर्भरण
अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1आसान
जलवायु परिवर्तन प्रभावों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील कौन-सी खेती है?
व्याख्या: समाचार विशेष रूप से बारिश-आधारित धान और गेहूं, यानी उन फसलों की पैदावार गिरावट की चेतावनी देता है जो पूरी तरह वर्षा पर निर्भर हैं। सिंचित खेती वर्षा की अनिश्चितता से कम प्रभावित होती है। जैविक और हाइड्रोपोनिक खेती इस चेतावनी का केंद्र नहीं हैं।
- Q2कठिन
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.जलवायु परिवर्तन से 2050 तक बारिश-आधारित धान और गेहूं की पैदावार 20% तक घट सकती है।
- 2.वैज्ञानिकों ने पैदावार बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में वृद्धि की सिफारिश की है।
- 3.वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है, क्योंकि वैज्ञानिकों ने रासायनिक उर्वरकों की नहीं, बल्कि मृदा पुनरुद्धार, वर्षा जल संचयन और टिकाऊ पद्धतियों की सिफारिश की। कथन 3 सही है, क्योंकि रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी। अतः विकल्प C सही है।
- Q3मध्यम
किस वर्ष तक बारिश-आधारित धान और गेहूं की पैदावार 20% तक घट सकती है?
व्याख्या: वैज्ञानिकों ने चेताया कि 2050 तक पैदावार घट सकती है। 2060 बाद का वर्ष है और इस अनुमान का हिस्सा नहीं है।
- Q4मध्यम
समाचार में सुझाई गई मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित खेती का मुख्य उद्देश्य क्या है?
व्याख्या: मिट्टी की गुणवत्ता सुधारना ज़रूरी है और पुनरुद्धार आधारित पद्धतियां तथा जल संरक्षण जलवायु प्रभावों को कम करने में मदद कर सकते हैं। GM बीज, यंत्रीकरण और बारिश-आधारित क्षेत्र घटाना इस सिफारिश का केंद्र नहीं हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. जलवायु परिवर्तन से 2050 तक बारिश-आधारित धान और गेहूं की पैदावार कितनी घट सकती है?
वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि 2050 तक पैदावार में अधिकतम 20% तक गिरावट हो सकती है।
2. इस पैदावार गिरावट से निपटने के लिए कौन-से समाधान सुझाए गए हैं?
सुझाए गए समाधानों में मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित खेती, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और टिकाऊ कृषि पद्धतियां शामिल हैं।
3. वह कौन-सा संस्थान है जिसके शिखर सम्मेलन में ये चेतावनियां चर्चा में आईं?
IIT कानपुर ने मृदा एवं पारिस्थितिकी पुनरुद्धार आधारित कृषि, जल और ऊर्जा विषय पर क्षेत्रीय ग्रामीण-भारत शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की।
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मूल खबर7 नवंबर 2026 · खबर पढ़ें
