प्रिलिम्स के लिए: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान का अधिकार, न्यायालय और पीठ, न्यायाधीश, मुख्य कानूनी प्रावधान, पुष्ट मूल सिद्धांत, वर्तमान संदर्भ
मेन्स के लिए: स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान, ट्रांसजेंडर अधिकार, BNS धारा 75, NALSA फैसला, बॉम्बे HC
वन-डे परीक्षा के 5 तथ्य
SSC, रेलवे, पुलिस और शिक्षक भर्ती में ऐसे ही सीधे सवाल आते हैं।
- बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने फैसला सुनाया।
- मामले की अध्यक्षता न्यायमूर्ति मेहरोज़ के. पठान ने की।
- इस मामले में BNS धारा 75 (महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न) शामिल थी।
- पीड़िता एक ट्रांसजेंडर महिला है जो खुद को महिला बताती है।
- आरोपी भारतीय सेना में अग्निवीर है।
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने फैसला दिया है कि जो ट्रांसजेंडर महिला खुद को महिला मानती है, वह भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानूनी संरक्षण पाने की हकदार है। अदालत ने आरोपी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि पीड़िता जैविक रूप से महिला नहीं है, इसलिए मामला रद्द किया जाए। अदालत ने स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान के अधिकार की पुष्टि की।
सारांश
- बॉम्बे उच्च न्यायालय (नागपुर पीठ) ने कहा कि जो ट्रांसजेंडर महिला खुद को महिला बताती है, वह महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न से जुड़े BNS प्रावधानों के तहत सुरक्षा का दावा कर सकती है।
- न्यायमूर्ति मेहरोज़ के. पठान ने कहा कि FIR रद्द करने के चरण में पीड़िता की स्व-घोषित लैंगिक पहचान पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
- अदालत ने आरोपी की इस दलील को खारिज कर दिया कि BNS की धारा 75 केवल जैविक महिलाओं पर लागू होती है। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान तय करने का कानूनी अधिकार है।
मुख्य बातें
ट्रांसजेंडर अधिकारों पर ऐतिहासिक फैसला
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि ट्रांसजेंडर महिला महिलाओं के लिए बने BNS यौन उत्पीड़न कानूनों के तहत कानूनी संरक्षण की हकदार है।
स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान की पुष्टि
अदालत ने पुष्टि की कि FIR रद्द करने के चरण में किसी व्यक्ति की स्व-घोषित लैंगिक पहचान को चुनौती नहीं दी जा सकती।
BNS धारा 75 की व्याख्या
अदालत ने माना कि BNS धारा 75 में 'महिला' शब्द में वह ट्रांसजेंडर महिला भी शामिल है, जो खुद को महिला बताती है।
पृष्ठभूमि
इस मामले में एक ट्रांसजेंडर महिला ने अग्निवीर सैनिक पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया, जिसने अक्टूबर 2025 में उससे शादी का वादा किया था। आरोपी ने BNS धारा 75 के तहत FIR रद्द करने की मांग की और तर्क दिया कि यह प्रावधान केवल जैविक महिलाओं पर लागू होता है। पीड़िता ने कथित घटनाओं के बाद ट्रांसजेंडर पहचान का आधिकारिक प्रमाण पत्र प्राप्त किया था।
प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव
न्यायमूर्ति पठान ने बचाव पक्ष की दलील खारिज करते हुए कहा कि FIR में साफ़ है कि शिकायतकर्ता खुद को महिला बताती है। अदालत ने जोर देकर कहा कि स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान कानूनी अधिकार है और आधिकारिक प्रमाण पत्र मिलने में देरी से कानूनी संरक्षण पर रोक नहीं लगती। यह फैसला ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के सिद्धांतों को मजबूत करता है और ट्रांसजेंडर अधिकारों पर सर्वोच्च न्यायालय के NALSA फैसले (2014) के अनुरूप है।
आगे की राह
अब यह मामला मुकदमे के लिए आगे बढ़ेगा। यह फैसला आपराधिक कानून में 'महिला' शब्द की व्याख्या पर निचली अदालतों के लिए एक मिसाल बनेगा और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की सुरक्षा का दायरा बढ़ा सकता है। इससे BNS के लैंगिक-तटस्थ प्रावधानों पर विधायी स्पष्टता की मांग भी उठ सकती है।
पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019
- संसद का एक अधिनियम, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण, उनके कल्याण और संबंधित विषयों के लिए बनाया गया है। यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ भेदभाव पर रोक लगाता है और उनके स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान के अधिकार को मान्यता देता है।
- स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान का अधिकार
- यह कानूनी सिद्धांत कि किसी व्यक्ति को बिना दबाव के अपनी लैंगिक पहचान तय करने का अधिकार है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने NALSA बनाम भारत संघ (2014) में स्वीकार किया था।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य
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परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- इन आंकड़ों पर ध्यान दें: बॉम्बे उच्च न्यायालय, नागपुर पीठ; न्यायमूर्ति मेहरोज़ के. पठान; BNS धारा 75
- इस नोडल निकाय पर ध्यान दें: बॉम्बे उच्च न्यायालय
- इस कानूनी बिंदु पर ध्यान दें: BNS धारा 75 (महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न); ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019
यह गलती न करें!
परीक्षक पूछ सकते हैं कि क्या BNS धारा 75 सभी ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर लागू होती है या केवल उन पर जो खुद को महिला बताते हैं। यह फैसला विशेष रूप से उस ट्रांसजेंडर महिला पर लागू होता है जो खुद को महिला बताती है, न कि सभी ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर। साथ ही, आधिकारिक प्रमाण पत्र मिलने में देरी से कानूनी अधिकारों पर असर नहीं पड़ता।
मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु
- स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान, ट्रांसजेंडर अधिकार, BNS धारा 75, NALSA फैसला, बॉम्बे HC
कहीं अटके? एक टैप में समझें
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि जो ट्रांसजेंडर महिला खुद को महिला मानती है, उसे यौन उत्पीड़न के खिलाफ वही कानूनी संरक्षण मिल सकता है जो किसी अन्य महिला को मिलता है। अदालत ने इस तर्क को खारिज किया कि कानून केवल जैविक महिलाओं की रक्षा करता है। इसका मतलब है कि कानूनी अधिकारों के लिए व्यक्ति की स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान मायने रखती है।
- बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने फैसला सुनाया।
- मामले की अध्यक्षता न्यायमूर्ति मेहरोज़ के. पठान ने की।
- इस मामले में BNS धारा 75 (महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न) शामिल थी।
- पीड़िता एक ट्रांसजेंडर महिला है जो खुद को महिला बताती है।
- आरोपी भारतीय सेना में अग्निवीर है।
- राजव्यवस्था: न्यायपालिका और मौलिक अधिकार
- समाज: ट्रांसजेंडर अधिकार और लैंगिक न्याय
जुड़ी अवधारणाएँ: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान का अधिकार
अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1आसान
किस उच्च न्यायालय ने हाल में यह फैसला सुनाया कि ट्रांसजेंडर महिला BNS के यौन उत्पीड़न प्रावधानों के तहत कानूनी संरक्षण की हकदार है?
व्याख्या: यह फैसला बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने न्यायमूर्ति मेहरोज़ के. पठान की अध्यक्षता में सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय, दिल्ली उच्च न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय इस विशेष फैसले में शामिल नहीं थे।
- Q2कठिन
ट्रांसजेंडर अधिकारों पर बॉम्बे उच्च न्यायालय के हाल के फैसले के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.अदालत ने कहा कि जो ट्रांसजेंडर महिला खुद को महिला बताती है, वह BNS धारा 75 के तहत संरक्षण की हकदार है।
- 2.अदालत ने माना कि BNS धारा 75 में 'महिला' शब्द केवल जैविक महिलाओं पर लागू होता है।
- 3.अदालत ने कहा कि आधिकारिक ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र मिलने में देरी कानूनी संरक्षण में बाधा नहीं है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 सही है क्योंकि अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि खुद को महिला बताने वाली ट्रांसजेंडर महिला BNS धारा 75 के तहत संरक्षण का दावा कर सकती है। कथन 2 गलत है क्योंकि अदालत ने इस तर्क को खारिज किया कि धारा 75 केवल जैविक महिलाओं पर लागू होती है। कथन 3 सही है क्योंकि अदालत ने कहा कि आधिकारिक प्रमाण पत्र मिलने में देरी कानूनी अधिकारों को प्रभावित नहीं करती। अतः विकल्प C सही है।
- Q3मध्यम
बॉम्बे उच्च न्यायालय के इस मामले में आरोपी ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की किस धारा के तहत FIR रद्द करने की मांग की?
व्याख्या: आरोपी ने BNS धारा 75 के तहत FIR रद्द करने की मांग की, जो महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न से संबंधित है। धारा 376 भारतीय दंड संहिता (IPC) का वह प्रावधान है जो बलात्कार से संबंधित है।
- Q4मध्यम
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस फैसले में किस मूल कानूनी सिद्धांत की पुष्टि की?
व्याख्या: अदालत ने स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान के अधिकार पर जोर दिया और इस तर्क को खारिज किया कि केवल जैविक महिलाएं संरक्षण का दावा कर सकती हैं। विकल्प A और D फैसले के उलट हैं। विकल्प C गलत है क्योंकि अदालत ने कहा कि प्रमाण पत्र मिलने में देरी संरक्षण में बाधा नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस मामले में क्या फैसला सुनाया?
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि खुद को महिला बताने वाली ट्रांसजेंडर महिला BNS धारा 75 के तहत कानूनी संरक्षण की हकदार है, जो महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न से संबंधित है।
2. इस मामले में न्यायाधीश कौन थे?
यह फैसला बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के न्यायमूर्ति मेहरोज़ के. पठान ने सुनाया।
3. इस मामले में आरोपी की दलील क्या थी?
आरोपी ने दलील दी कि BNS धारा 75 केवल जैविक महिलाओं पर लागू होती है, इसलिए ट्रांसजेंडर महिला के यौन उत्पीड़न के मामले में उसके खिलाफ FIR रद्द की जानी चाहिए।

