प्रिलिम्स के लिए: यूरिया, कोल गैसीकरण, CSIR-CIMFR, तकनीक विकसित करने वाली संस्था, स्वदेशी यूरिया का कच्चा माल, मौजूदा यूरिया आयात निर्भरता, कॉमर्शियल यूरिया की कार्यक्षमता, परियोजना की समय-सीमा
मेन्स के लिए: कचरे से संपदा, आयात प्रतिस्थापन, चक्रीय अर्थव्यवस्था, कोल गैसीकरण, उर्वरक सुरक्षा
स्रोत:Dainik Bhaskar
वन-डे परीक्षा के 5 तथ्य
SSC, रेलवे, पुलिस और शिक्षक भर्ती में ऐसे ही सीधे सवाल आते हैं।
- CSIR-CIMFR ने कोल गैसीकरण की राख से नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक बनाया है।
- भारत अपनी यूरिया का 30% आयात करता है और घरेलू उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस भी आयात करता है।
- कॉमर्शियल यूरिया का केवल 35-40% उपयोग होता है; 60% खेतों में बर्बाद हो जाता है।
- परियोजना को कोयला मंत्रालय ने मंज़ूरी दी है और यह दो साल में पूरी होगी।
- CSIR-CIMFR का मुख्यालय झारखंड के धनबाद में है।
चर्चा में क्यों?
CSIR-CIMFR के वैज्ञानिकों ने कोल गैसीकरण की राख से नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक बनाने की तकनीक विकसित की है। यह स्वदेशी यूरिया कॉमर्शियल यूरिया से अधिक कारगर होगा, जिसका 60% खेतों में बर्बाद हो जाता है, और इससे भारत की यूरिया तथा उसके कच्चे माल, प्राकृतिक गैस, के आयात पर 30% निर्भरता घटेगी। कोयला मंत्रालय ने इस परियोजना को मंज़ूरी दी है, जो दो साल में पूरी होगी।
सारांश
- CSIR-CIMFR के वैज्ञानिकों ने कोल गैसीकरण की राख से नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक बनाने की तकनीक विकसित की है। अब तक इस राख को बेकार माना जाता था।
- कोयला मंत्रालय की मंज़ूरी से शुरू हुई यह परियोजना दो साल में पूरी होगी। इसे प्रयोगशाला स्तर से बढ़ाकर बेंच स्केल (प्रति बैच 5 किलो) तक ले जाया जाएगा।
- भारत अपनी यूरिया ज़रूरत का 30% सीधे आयात करता है। साथ ही घरेलू यूरिया उत्पादन के कच्चे माल, प्राकृतिक गैस, का भी आयात होता है। यह स्वदेशी उर्वरक इस निर्भरता को घटाने का लक्ष्य रखता है।
मुख्य बातें
नई तकनीक विकसित
CSIR-CIMFR के वैज्ञानिकों ने कोल गैसीकरण की राख से नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक बनाने की प्रक्रिया तैयार की है।
आयात निर्भरता में कमी
भारत 30% यूरिया सीधे आयात करता है और घरेलू उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस भी आयात करता है। यह तकनीक दोनों पर असर डालने का लक्ष्य रखती है।
अधिक कारगर उर्वरक
नया उर्वरक कॉमर्शियल यूरिया से अधिक कारगर बताया गया है, जिसका 60% नाइट्रोजन खेतों में बर्बाद हो जाता है।
पृष्ठभूमि
भारत यूरिया का बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन उसका घरेलू उत्पादन कच्चे माल के रूप में आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भर है। देश अपने यूरिया का 30% सीधे आयात भी करता है। कोल गैसीकरण में कोयले को सिनगैस में बदला जाता है और उप-उत्पाद के रूप में राख बनती है, जिसे अब तक बेकार माना जाता था। CSIR-CIMFR ने अब इस राख के उपयोग से नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक बनाने का रास्ता खोजा है।
प्रमुख विश्लेषण एवं प्रभाव
इस नवाचार से दो अहम समस्याएँ सुलझाने का दावा है: कोल गैसीकरण से निकलने वाले कचरे का प्रबंधन और उर्वरकों पर आयात निर्भरता। दावे के अनुसार नया उर्वरक खेतों में कॉमर्शियल यूरिया (जिसका केवल 35-40% उपयोग होता है) की तुलना में कम नाइट्रोजन बर्बाद करता है। इससे कुल उर्वरक ज़रूरत घट सकती है, विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और मिट्टी की सेहत सुधर सकती है। कोयला मंत्रालय का समर्थन मिलना परियोजना की रणनीतिक अहमियत दर्शाता है।
आगे की राह
तकनीक अभी बेंच स्केल (प्रति बैच 5 किलो) पर है और व्यावसायिक उत्पादन के लिए इसे बड़े स्तर पर ले जाना होगा। परियोजना के दो साल में पूरा होने की उम्मीद है। सफल विस्तार से आयात बिल घट सकता है, सब्सिडी का बोझ कम हो सकता है और कोल गैसीकरण संयंत्रों के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था का मॉडल बन सकता है।
कॉमर्शियल बनाम नया उर्वरक
| विशेषता | कॉमर्शियल यूरिया | नया उर्वरक (कोल राख से) |
|---|---|---|
| कच्चा माल | प्राकृतिक गैस (आयातित) | कोल गैसीकरण की राख (कचरा) |
| नाइट्रोजन उपयोग | 35-40% | अधिक (अधिक कारगर) |
| खेतों में बर्बादी | 60% | कम |
झारखंड से जुड़ाव
पृष्ठभूमि GK
इस खबर को समझने के लिए आवश्यक मूल अवधारणाएं
- यूरिया
- नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक (46% N), जो भारत में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला नाइट्रोजनी उर्वरक है। यह पानी में घुलनशील है और पौधों को नाइट्रोजन देता है।
- कोल गैसीकरण
- वह प्रक्रिया जिसमें कोयले को सिनगैस (संश्लेषित गैस) में बदला जाता है। इसमें कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन होती हैं। पीछे बची राख उप-उत्पाद है।
- CSIR-CIMFR
- केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक घटक प्रयोगशाला है, जिसका मुख्यालय झारखंड के धनबाद में है।
परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य
पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर उत्तर देखने के लिए कार्ड पर क्लिक करें।
परीक्षा में कैसे पूछा जाएगा
- इस आँकड़े पर ध्यान दें: 30% यूरिया आयात निर्भरता
- इस नोडल निकाय पर ध्यान दें: कोयला मंत्रालय
यह गलती न करें!
'नोडल मंत्रालय' के बारे में पूछा जा सकता है। यह कोयला मंत्रालय है (रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय या विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय नहीं), क्योंकि परियोजना को कोयला मंत्रालय ने मंज़ूरी दी और यह कोल इंडिया के हैकथॉन से निकली।
मुख्य परीक्षा के उत्तर-लेखन के लिए उपयोगी बिंदु
- कचरे से संपदा, आयात प्रतिस्थापन, चक्रीय अर्थव्यवस्था, कोल गैसीकरण, उर्वरक सुरक्षा
कहीं अटके? एक टैप में समझें
कोल गैसीकरण के बाद बची राख को अब तक बेकार माना जाता था। CSIR-CIMFR के वैज्ञानिकों ने इस राख से यूरिया जैसा नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक बनाने का तरीका खोजा है। यह नया उर्वरक सामान्य यूरिया से बेहतर है, क्योंकि सामान्य यूरिया का 60% नाइट्रोजन पौधों तक पहुंचने से पहले खेतों में बर्बाद हो जाता है। भारत में ही यह उर्वरक बनने से दूसरे देशों से यूरिया आयात करने की ज़रूरत घटेगी।
- CSIR-CIMFR ने कोल गैसीकरण की राख से नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक बनाया है।
- भारत अपनी यूरिया का 30% आयात करता है और घरेलू उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस भी आयात करता है।
- कॉमर्शियल यूरिया का केवल 35-40% उपयोग होता है; 60% खेतों में बर्बाद हो जाता है।
- परियोजना को कोयला मंत्रालय ने मंज़ूरी दी है और यह दो साल में पूरी होगी।
- CSIR-CIMFR का मुख्यालय झारखंड के धनबाद में है।
- विज्ञान और प्रौद्योगिकी: कचरे से संपदा बनाने वाली तकनीकें
- अर्थव्यवस्था: उर्वरक सेक्टर और आयात निर्भरता
जुड़ी अवधारणाएँ: यूरिया, कोल गैसीकरण, CSIR-CIMFR
अभ्यास प्रश्न
उत्तर चुनें, फिर व्याख्या देखें।
- Q1आसान
कोल गैसीकरण की राख से नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक बनाने की तकनीक किस संस्था ने विकसित की?
व्याख्या: यह तकनीक CSIR-CIMFR (केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान) ने विकसित की है। CSIR-NCL एक अलग प्रयोगशाला है, IIT खड़गपुर एक शैक्षणिक संस्थान है और NIFTEM खाद्य प्रौद्योगिकी से जुड़ा है। अतः विकल्प B सही है।
- Q2कठिन
नई उर्वरक तकनीक के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1.नया उर्वरक कोल गैसीकरण की राख से बनता है, जिसे पहले बेकार माना जाता था।
- 2.भारत वर्तमान में अपनी यूरिया का 30% आयात करता है और घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस भी आयात करता है।
- 3.नया उर्वरक कॉमर्शियल यूरिया से कम कारगर है, जिसमें खेतों में नाइट्रोजन की हानि अधिक होती है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
व्याख्या: कथन 1 सही है, क्योंकि तकनीक कोल गैसीकरण की राख का उपयोग करती है। कथन 2 सही है, क्योंकि भारत 30% यूरिया आयात करता है और घरेलू उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस भी आयात करता है। कथन 3 गलत है, क्योंकि नया उर्वरक अधिक कारगर है और उसमें बर्बादी कम है। अतः विकल्प C सही है।
- Q3मध्यम
खेतों में कॉमर्शियल यूरिया का कितना प्रतिशत बर्बाद हो जाता है?
व्याख्या: 100 किलो कॉमर्शियल यूरिया डालने पर पौधे केवल 35-40 किलो उपयोग कर पाते हैं, यानी लगभग 60% बर्बाद होता है। 30% भारत की आयात निर्भरता का आँकड़ा है, बर्बादी का प्रतिशत नहीं। अतः विकल्प D सही है।
- Q4मध्यम
CSIR-CIMFR द्वारा विकसित नई उर्वरक तकनीक का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
व्याख्या: तकनीक का लक्ष्य बेकार राख से स्वदेशी यूरिया बनाना है, ताकि तैयार यूरिया और उसके कच्चे माल (प्राकृतिक गैस) दोनों के आयात की ज़रूरत घटे। राख का निर्यात या नया कोयला विकसित करना इसका लक्ष्य नहीं है, न ही कॉमर्शियल यूरिया में बदलाव। अतः विकल्प B सही है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. CSIR-CIMFR द्वारा विकसित नई उर्वरक तकनीक क्या है?
CSIR-CIMFR ने कोल गैसीकरण की राख से नाइट्रोजन-युक्त उर्वरक (यूरिया) बनाने की तकनीक विकसित की है, जिसे पहले बेकार माना जाता था।
2. भारत कितना यूरिया आयात करता है?
भारत अपना 30% यूरिया सीधे विदेशों से आयात करता है।
3. नए उर्वरक की तुलना में कॉमर्शियल यूरिया की कार्यक्षमता कितनी है?
कॉमर्शियल यूरिया का केवल 35-40% उपयोग होता है और 60% बर्बाद हो जाता है। नए उर्वरक को अधिक कारगर और कम बर्बादी वाला बताया गया है।
4. यह परियोजना किस मंत्रालय ने मंज़ूर की?
कोयला मंत्रालय ने इस परियोजना को मंज़ूरी दी है, जो दो साल में पूरी होने की उम्मीद है।
सभी स्रोत
मूल खबर7 नवंबर 2026 · खबर पढ़ें

